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जीवन उर्जा का महासागर है जब अंतश्चेतना जागृत होती है तो उर्जा जीवन को
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भॉंति है जिसका कोई चोर नहीं । इतनी विशाल इतनी विस्तृत । अनेक विधाओं को अपने में समेटे । तभी तो कवि मन कह उठा-
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साक्षात् पशुपुच्छ विषाणहीन ।।”
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टालस्टाय के शब्दों में अपने भावों की क्रिया, रेखा रंग ध्वनि या शब्द द्वारा इस प्रकार अभिव्यक्ति करना कि उसे देखने या सुनने में भी वही भाव उत्पन्न हो जाए कला
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कठिन तपस्या है । साधना है । इसी के माध्यम से कलाकार सुनहरी और इन्द्रधनुष आत्मा से स्वप्निल विचारों को साकार रुप देना है ।
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कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएं उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अदभुत क्षमता है । मनोरंजन, सौन्दये, प्रवाह, उल्लास न जाने कितने तत्वों से यह भरपूर है जिसमें मानवीयता को सम्मोहित करने की शक्ति
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जब यह कला संगीत के रुप में उभरती है तो कलाकार गायन और वादन से स्वयं को ही नहीं श्रोताओं को भी अभिभूत कर देता है । मनुष्य आत्मविस्मृत हो उठता है । दीपक राग से दीपक जल उठता है और मल्हार राग से मेघ बरसना यह कला की साधना का ही चरमोत्कर्ष है । संगीत की साधना । सुरों की साधना । मिलना है आत्मा से
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भाट और चारण भी जब युद्धस्थल में उमंग, जोश से सरोबार कविता-गान करते थे तो वीर योद्धाओं का उत्साह दोगुना हो जाता था तो युद्धक्षेत्र कहीं हाथी की चिंघाड़, तो कहीं घोड़ों की हिनहिनाहट तो कहीं शत्रु की चीत्कार से भर उठता था यह गायन कला की परिणति ही तो है ।
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संगीत है शक्ति ईश्वर की,
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रागी तो गाए रागिनी,
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संगीत के बाद ये ललित-कलाओं में स्थान दिया गया है तो वह है- नृत्यकला । चाहे वह भरतनाट्यम हो या कत्थक, मणिपुरी हो या कुचिपुड़ी । विभिन्न भाव-भंगिमाओं से युक्त हमारी सांस्कृति व पौराणिक कथाओं को ये नृत्य जीवन्तता प्रदान करते हैं । शास्त्रीय नृत्य हो या लोकनृत्य इनमें खोकर तन ही नहीं मन भी झूम उठता है ।
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होते रहे हैं ये मात्र एक विधा नहीं, अपितू ये मानवता के विकास का एक निश्चित सोपान प्रस्तुत करते हैं । चित्रों के माध्यम से आखेट करने वाले आदिम मानव ने न केवल अपने संवेगों को बल्कि रहस्यमय प्रवृत्ति और जंगल के खूंखार प्रवासियों के विरुद्ध अपने अस्तित्व के लिए किए गए संघर्ष को भी अभिव्यक्त किया है । धीरे-धीरे चित्रकला शिल्पकला सोपान चढ़ी । सिन्धुघाटी सभ्यता में पाए गए चित्रों में पशु-पक्षी मानवआकृति
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अजन्ता बाध आदि के गुफा चित्रों की कलाकृतियों पूर्व बौद्धकाल के अन्तर्गत आती है । भारतीय कला का उज्जवल इतिहास भित्ति चित्रों से ही प्रारम्भ होता है और संसार में इनके समान चित्र कहीं नहीं बने ऐसा विद्वानों का मत है । अजन्ता के कला मन्दिर प्रेम,धैर्य, उपासना, भक्ति, सहानुभूति, त्याग तथा शान्ति के अपूर्व उदाहरण है ।
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यही नहीं भारतीय संस्कृति में लोक कलाओं की खुशबू की महक आज भी अपनी प्राचीन परम्परा से समृद्ध है । जिस प्रकार आदिकाल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं है परन्तु यह निश्चित है कि सहचरी के रुप में कला सदा से ही साथ रही है । लोक कलओं का जन्म भावनाओं और परम्पराओं पर आधारित है क्योंकि यह जनसामान्य की अनुभूति की
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से प्रसिद्ध है । यह कला धर्मानुप्रागित भावों से प्रेशर होती है । जिसमें श्रृद्धा से रचना की जाती है । विवाह और शुभ अवसरों में लोककला का विशिष्ट स्थान है । द्वारों पर अलंकृत घड़ों का रखना उसमें जल व नारियल रखना वन्दनवार बांधना आदि को आज के आधुनिक युग में भी इसे आदरभाव, श्रृद्धा और उपासना की दृष्टि से देखा जाता है ।
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सत्य, अहिंसा, करुणा, समन्वय और सर्वधर्म समभाव ये भारतीय संस्कृति के ऐसे तत्त हैं जिन्होंने अनेक बाधाओं के बीच भी हमारी संस्कृति की निरन्तरता को अक्षुण बनाए रखा है । इन विशेषताओं ने हमारी संस्कृति में वह शक्ति उत्पन्न की कि वह भारत के बाह एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी जड़े फैला सकी ।
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परन्तु प्रश्न उठता है कि पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित आधुनिकता का जामा पहने हमारी कला अपनी उत्कृष्टा, आदर्शवादिता, तेजस्विता कहीं खो तो नहीं रही । ये वीडियोक्रान्ति, केबल नेटवर्क, इन्टरनेट आदि का आधिपत्य समाज को कहीं अपसंस्कृति की ओर तो नहीं ले जा रहा है । चाहे संगीत हो या मूर्तिकला, चित्रकला या नृत्यकला अपनी गरिमा खोती जा रही है । अभिनयकला के माध्यम् यदा कदा किसी उदाहरण को छोड़कर प्रेरक प्रसंगों का कोई नामोनिशान नहीं । हिंसा, उच्छृंखलता एवं पशु प्रवृत्ति
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मानव मन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली कला और मनोरंजन का साधन दूरदर्शन पैसा बनाने की होड़ में प्रसिद्धि पाने के लिए वाह-वाही के लिए मूल्यहीन,हिंसाप्रधान धारावाहित प्रस्तुत कर परिवारों को तोड़ रहा है । नारी को न केवल श्रृंगारिकता का पर्याय बना दिया गया है वह खलनायिका भी है । दुष्टा भी है दिखाई गई है । वाद्ययंत्रों में अब कर्णभेदी संगीत का प्रयोग होने लगा है नाट्य-कला थियेटर कला अपनी पहचान खो रही है ।
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यदि कला जैसी मानवीय अंतकरण की अभिव्यंजना इस प्रकार अध:पतित होती चली जाएगी तो भारतीय आदर्शों का प्रवाह भी पतनोन्मुख होता चला जाएगा । अत:समय आ गया है हमें “लोकरंजन से लोक-मंगल” की ओर पुन: कदम उठाना होगा । तभी भारतीय कला की सशक्त पहचान बनी रहेगी ।