‍कला


    जीवन उर्जा का महासागर है जब अंतश्‍चेतना जागृत होती है तो उर्जा जीवन को

    कला के रुप में उभारती है । कला जीवन को सत्‍यम् शिवम् सुन्‍दरम् से समन्वित करती है । इसके द्वारा ही बुद्धि आत्‍मा का सत्‍य स्‍वरुप झलकता है । कला उस क्षितिज की भॉंति है जिसका कोई चोर नहीं । इतनी विशाल इतनी विस्‍तृत । अनेक विधाओं को अपने में समेटे । तभी तो कवि मन कह उठा-

    “साहित्‍य संगीत कला वि‍हीन ।

    साक्षात् पशुपुच्‍छ विषाणहीन ।।”

    रविन्‍द्रनाथ ठाकुर के मुख से निकला “कला में मनुष्‍य अपने भावों की अभिव्‍यक्ति करता है ” तो प्‍लेटो ने कहा - “कला सत्‍य की अनुकृति के अनुकृति है ।”

    टालस्‍टाय के शब्‍दों में अपने भावों की क्रिया, रेखा रंग ध्‍वनि या शब्‍द द्वारा इस प्रकार अभिव्‍यक्ति करना कि उसे देखने या सुनने में भी वही भाव उत्‍पन्‍न हो जाए कला है । हृदय की गइराईयों से निकली अनुभूति जब कला का रुप लेती है कलाकार का अन्‍तर्मन मानो मूर्त ले उठता है चाहे लेखनी उसका माध्‍यम हो या रंगों से भी तूलिका या सुरों की पुकार या बाधों की झंकार । कला ही आत्मिक शान्ति का माध्‍यम है । यह ‍कठिन तपस्‍या है । साधना है । इसी के माध्‍यम से कलाकार सुनहरी और इन्‍द्रधनुष आत्‍मा से स्‍वप्निल विचारों को साकार रुप देना है ।

    कला में ऐसी शक्ति होनी चाहिए कि वह लोगों को संकीर्ण सीमाओं से ऊपर उठाकर उसे ऐसे उंचे स्‍थान पर पहुंचा दे जहां मनुष्‍य केवल मनुष्‍य रह जाता है । कला व्‍यक्ति के मन में बनी स्‍वार्थ, परिवार, क्षेत्र, धर्म, भाषा और जाति आदि की सीमाएं मिटाकर विस्‍तृत और व्‍यापकता प्रदान करती है । व्‍यक्ति के मन को उदात्‍त बनाती है । वह व्‍यक्ति को “स्‍व” से निकालकर “वसुधैव कुटुम्‍बकम” से जोड़ती है ।

    कला ही है जिसमें मानव मन में संवेदनाएं उभारने, प्रवृत्तियों को ढालने तथा चिंतन को मोड़ने, अभिरुचि को दिशा देने की अदभुत क्षमता है । मनोरंजन, सौन्‍दये, प्रवाह, उल्‍लास न जाने कितने तत्‍वों से यह भरपूर है जिसमें मानवीयता को सम्‍मोहित करने की शक्ति है । यह अपना जादू तत्‍काल दिखाती है और व्यक्ति को बदलने में लोहा पिघलाकर पानी बना देने वाली भट्टी की तरह मनोवृत्तियों में भारी रुपान्‍तरण प्रस्‍तुत कर सकती है ।

    जब यह कला संगीत के रुप में उभरती है तो कलाकार गायन और वादन से स्‍वयं को ही नहीं श्रोताओं को भी अभिभूत कर देता है । मनुष्‍य आत्‍मविस्‍मृत हो उठता है । दीपक राग से दीपक जल उठता है और मल्‍हार राग से मेघ बरसना यह कला की साधना का ही चरमोत्‍कर्ष है । संगीत की साधना । सुरों की साधना । मिलना है आत्‍मा से परमात्‍मा का । अभिव्‍यक्ति है अनुभूति की ।

    भाट और चारण भी जब युद्धस्‍थल में उमंग, जोश से सरोबार कविता-गान करते थे तो वीर योद्धाओं का उत्‍साह दोगुना हो जाता था तो युद्धक्षेत्र कहीं हाथी की चिंघाड़, तो कहीं घोड़ों की हिनहिनाहट तो कहीं शत्रु की चीत्‍कार से भर उठता था यह गायन कला की परिणति ही तो है ।

    संगीत केवल मानवमात्र में ही नहीं अपितु पशु-पक्षियों व पेड़ पौधों में भी अमृत रस भर देता है । पशु पक्षी भी संगीत से प्रभावित होकर झूम उठते हैं तो पेड़-पौधों में भी स्‍पन्‍दन हो उठता है । तरंगें फूट पड़ती हैं । यही नहीं मानव के अनेक रोगों का उपचार भी संगीत की तरंगों से सम्‍भव है । कहा भी है:

    संगीत है शक्ति ईश्‍वर की,

    हर सुर में बसे हैं राम ।

    रागी तो गाए रागिनी,

    रोगी को मिले आराम ।।

    संगीत के बाद ये ललित-कलाओं में स्‍थान दिया गया है तो वह है- नृत्‍यकला । चाहे वह भरतनाट्यम हो या कत्‍थक, मणिपुरी हो या कुचिपुड़ी । विभिन्‍न भाव-भंगिमाओं से युक्‍त हमारी सांस्‍कृति व पौराणिक कथाओं को ये नृत्‍य जीवन्‍तता प्रदान करते हैं । शास्‍त्रीय नृत्‍य हो या लोकनृत्‍य इनमें खोकर तन ही नहीं मन भी झूम उठता है ।

    कलाओं में कला, श्रेष्‍ठ-कला वह है चित्रकला । मनुष्‍य स्‍वभाव से ही अनुकरण की प्रवृत्ति रखता है । जैसा देखता है उसी प्रकार अपने को ढालने का प्रयत्‍न करता है । यही उसकी आत्‍माभिव्‍यंजना है । अपनी रंगों से भरी तूलिका से चित्रकार जन भावनाओं की अभिव्‍यक्ति करता है तो दर्शक हतप्रभ रह जाता है । पाषाण युग से ही जो चित्र प्राइज़ होते रहे हैं ये मात्र एक विधा नहीं, अपितू ये मानवता के विकास का एक निश्चित सोपान प्रस्‍तुत करते हैं । चित्रों के माध्‍यम से आखेट करने वाले आदिम मानव ने न केवल अपने संवेगों को बल्कि रहस्‍यमय प्रवृत्ति और जंगल के खूंखार प्रवासियों के विरुद्ध अपने अस्तित्व के लिए किए गए संघर्ष को भी अभिव्‍यक्‍त किया है । धीरे-धीरे चित्रकला शिल्‍पकला सोपान चढ़ी । सिन्‍धुघाटी सभ्‍यता में पाए गए चित्रों में पशु-पक्षी मानवआकृति सुन्‍दर प्रतिमाएं, ज्यादा नमूने भारत की आदिसभ्‍यता की कलाप्रियता का द्योतक है ।

    अजन्‍ता बाध आदि के गुफा चित्रों की कलाकृतियों पूर्व बौद्धकाल के अन्‍तर्गत आती है । भारतीय कला का उज्‍जवल इतिहास भित्ति चित्रों से ही प्रारम्‍भ होता है और संसार में इनके समान चित्र कहीं नहीं बने ऐसा विद्वानों का मत है । अजन्‍ता के कला मन्दिर प्रेम,धैर्य, उपासना, भक्ति, सहानुभूति, त्‍याग तथा शान्ति के अपूर्व उदाहरण है ।

    मधुबनी शैनी, पहाड़ी शैली, तंजौर शैली, मुगल शैली, बंगाल शैली अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण आज जनशक्ति के मन चिहिन्त है । यदि भारतीय संस्‍कृति की मूर्ति कला व शिल्प कला के दर्शन करने हो तो दक्षिण के मन्दिर अपना विशिष्‍ट स्‍थान रखते हैं । जहां के मीनाक्षी मन्दिर, वृहदीश्‍वर मन्दिर, कोणार्क मन्दिर अपनी अनूठी पहचान के लिए प्रसिद्ध है ।

    यही नहीं भारतीय संस्‍कृति में लोक कलाओं की खुशबू की महक आज भी अपनी प्राचीन परम्‍परा से समृद्ध है । जिस प्रकार आदिकाल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं है परन्‍तु यह निश्चित है कि सहचरी के रुप में कला सदा से ही साथ रही है । लोक कलओं का जन्‍म भावनाओं और परम्‍पराओं पर आधारित है क्‍योंकि यह जनसामान्‍य की अनुभूति की अभिव्यक्ति है । यह वर्तमान शास्त्रीय और व्‍यावसायिक कला की पृष्‍ठभूमि भी है । भारतवर्ष में पृथ्‍वी को धरती माता कहा गया है । मातृभूति तो इसका सांस्कृतिक व परिष्कृत रुप है । इसी धरती माता का श्रृद्धा से अलंकरण करके लोकमानव में अपनी आत्‍मीयता का परिचय दिया विभिन्‍न नामों से धरती को अलंकृत किया जाता है । गुजरात में “साथिया” राजस्‍थान में “माण्‍डना”, महाराष्‍ट्र में “रंगोली” उत्‍तर प्रदेश में “चौक पूरना”, बिहार में “अहपन”, बंगाल में “अल्‍पना” और गढ़वाल में “आपना” के नाम से प्रसिद्ध है । यह कला धर्मानुप्रागित भावों से प्रेशर होती है । जिसमें श्रृद्धा से रचना की जाती है । विवाह और शुभ अवसरों में लोककला का विशिष्‍ट स्‍थान है । द्वारों पर अलंकृत घड़ों का रखना उसमें जल व नारियल रखना वन्‍दनवार बांधना आदि को आज के आधुनिक युग में भी इसे आदरभाव, श्रृद्धा और उपासना की दृष्टि से देखा जाता है ।

    आज भारत की वास्‍तुकला का सर्वर उदाहरण “ताजमहल” है जिसने विश्‍व की अपूर्व कलाकृत्तियॉं के सात आश्‍चर्य में शीर्षस्‍थ स्‍थान पाया है । लालकिला, अक्षरधाम मन्दिर, कुतुबमीनार, जामा मस्जिद भी भारतीय वास्‍तुकला का अनुपम उदाहरण रही है । मूर्तिकला, समन्‍वयवादी वास्‍तुकला तथा भित्तिचित्रों की कला के साथ-साथ पर्वतीय कलाओं ने भी भारतीय कला से समृद्ध किया है ।

    सत्‍य, अहिंसा, करुणा, समन्‍वय और सर्वधर्म समभाव ये भारतीय संस्‍कृति के ऐसे तत्‍त हैं जिन्‍होंने अनेक बाधाओं के ‍बीच भी हमारी संस्‍कृति की निरन्‍तरता को अक्षुण बनाए रखा है । इन विशेषताओं ने हमारी संस्कृति में वह शक्ति उत्पन्‍न की कि वह भारत के बाह एशिया, दक्षिण पूर्व एशिया में अपनी जड़े फैला सकी ।

    हमारी संस्‍कृति के इन तत्‍वों को प्राचीन काल से लेकन आज तक की कलाओं में देखा जा सकता है । इन्‍हीं ललित कलाओं ने हमारी संस्‍कृति को सत्‍य, शिव, सौन्‍दर्य जैसे अनेक सकारात्‍मक पक्षों को चित्रित किया है । इन कलाओं के माध्‍यम से ही हमारा लोकजीवन, लोकमानस तथा जीवन का आं‍तरिक और आध्‍यात्मिक पक्ष अभिव्‍यक्‍त होता रहा है हमें अपनी इस परम्‍परा से कटना नहीं है ‍अपितु अपनी परम्‍परा से ही रस लेकर आधुनिकता को चित्रित करना है ।

    परन्‍तु प्रश्‍न उठता है कि पाश्‍चात्‍य संस्‍कृति से प्रभावित आधुनिकता का जामा पहने हमारी कला अपनी उत्‍कृष्‍टा, आदर्शवादिता, तेजस्विता कहीं खो तो नहीं रही । ये वीडियोक्रान्ति, केबल नेटवर्क, इन्‍टरनेट आदि का आधिपत्‍य समाज को कहीं अपसंस्‍कृति की ओर तो नहीं ले जा रहा है । चाहे संगीत हो या मूर्तिकला, चित्रकला या नृत्‍यकला अपनी गरिमा खोती जा रही है । अभिनयकला के माध्‍यम् यदा कदा किसी उदाहरण को छोड़कर प्रेरक प्रसंगों का कोई नामोनिशान नहीं । हिंसा, उच्छृंखलता एवं पशु प्रवृत्ति भड़काने वाली दुष्‍प्रवृत्तियां आंधी तूफान की तरह पनप रही है ।

    मानव मन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली कला और मनोरंजन का साधन दूरदर्शन पैसा बनाने की होड़ में प्रसिद्धि पाने के लिए वाह-वाही के लिए मूल्‍यहीन,हिंसाप्रधान धारावाहित प्रस्‍तुत कर परिवारों को तोड़ रहा है । नारी को न केवल श्रृंगारिकता का पर्याय बना दिया गया है वह खलनायिका भी है । दुष्‍टा भी है दिखाई गई है । वाद्ययंत्रों में अब कर्णभेदी संगीत का प्रयोग होने लगा है नाट्य-कला थियेटर कला अपनी पहचान खो रही है ।

    चित्रकला की बड़ी-बड़ी आर्ट गैलरियों की प्रदर्शनीपरक आयोजनों की सात्विकता तो कहीं छुप बैठी है जिसकी जगह ता‍मसिक प्रवृत्तियॉं हावी है ।

    यदि कला जैसी मानवीय अंतकरण की अभिव्‍यंजना इस प्रकार अध:पतित होती चली जाएगी तो भारतीय आदर्शों का प्रवाह भी पतनोन्‍मुख होता चला जाएगा । अत:समय आ गया है हमें “लोकरंजन से लोक-मंगल” की ओर पुन: कदम उठाना होगा । तभी भारतीय कला की सशक्‍त पहचान बनी रहेगी ।