१. सामान्य (कोलन)
मनुष्य के जीवनयापन के लिए सामग्री की आवश्यकता उतनी ही पुरानी है जितना कि मानव इतिहास । फिर भी द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व तक सामग्री प्रबन्धन को इतना महत्व नहीं प्राप्त हुआ जितना कि यह विषय अब महत्वपूर्ण है । द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिका एवं यूरोपीय देशों में रक्षा सामग्री के योजनाबद्ध तरीके से प्रापण एवं प्रबन्धक की बात की गयी जिसमें रक्षा उपकरणों एवं युद्ध के समय प्रयोग में आने वाली सामग्री का योजनाबद्ध रूप से उत्पादन, प्रापण निरीक्षण, भंडारण, प्रेषण एवं रख रखाव के विषय में गहन रूप से विचार किया गया । धीरे धीरे सामग्री प्रबंधन ऐसा व्यापक विषय बन गया जिसके अंतर्गत सामग्री प्रापण की योजना से लेकर उसके अंतिम उपयोग तक गहन अध्ययन का विषय बन गया । भारत में बीसवीं सदी के छठे दशक तक सामग्री प्रंबधन विषय का कोई विशेष महत्व नहीं रहा । सातवें दशक से इसकी उपयोगिता पर ध्यान दिया जाने लगा और आज उन्नत देशों में ही नहीं हमारे देश में भी इसके विकास में सामग्री प्रबंधन का विशेष महत्वपूर्ण स्थान है । सामग्री प्रबन्धन को तीन भागों में वगीकृत किया जा सकता है ।
१.सामग्री प्रबंधन योजना एवं नियंत्रण
२.सामग्री क्रय प्रबंधन
३.भंडार प्रबंधन
सामग्री प्रबंधन में सामग्री क्रय प्रबंधन की मुख्य भूमिका है क्योंकि किसी भी कम्पनी या संगठन में ६० से ७० प्रतिशत धन सामग्री क्रय के मद में व्यय होता है । यदि सामग्री एवं मानव भ्रम दोनों को मिलाकर देखें तो लगभग ८० प्रतिशत व्यय इन्हीं दो मदों में होता है । देश की जीवन रेखा कहलाने वाली भारतीय रेल एक विशाल काम संगठन है । इसके संचालन में लगभग ७५०० रेल इंजनों, ४१००० यात्री डिब्बों, २.४ लाख माल वाहक डिब्बों, इसके ७००० स्टेशनों के लगभग ६४ हजार किलोमीटर की रेल लाईनों के ऊपर दौड़ने वाली प्रतिदिन १०००० रेलगाडिय़ों के रखरखाव एवं मरम्मत में लगने वाली सामग्री की प्रचुर मात्रा में आवश्यकता होती है । इसके प्रापण हेतु वर्ष में लाखों निविदायें की जाती हैं जिससे लगभग १४००० स्टॉक एवं ७५०० नॉन स्टॉंक मदों का क्रय किया जाता है । इसका वार्षिक क्रय लगभग १२००० करोड़ रूपये का है ।
२.निविदा परिचय(कोलन)
किसी भी संस्थान में आवश्यक वस्तुओं का खरीदना एक महत्वपूर्ण फैसला होता है प्रत्येक संस्थान यह अवश्य चाहेगा कि उसके खर्च किए धन का सबसे अच्छा मूल्य प्राप्त हो और जब बात सरकारी संस्थान की हो तो इस सिद्धांत की महत्ता और भी बढ़ जाती है क्योंकि इसमें आम जनता का पैसा खर्च किया जाता है इस प्रक्रिया में क्रय की दरों को सबसे न्यूनतम रखने में टेण्डर व्यवस्था सबसे अधिक प्रभावशाली है ।
टेण्डर व्यवस्था से तात्पर्य है कि संभावित आपूर्ति कर्त्ताओं से निविदायें मंगायी जायें और सबसे न्यूनतम को स्वीकृत कर लिया जाये यद्यपि टेण्डर व्यवस्था में स्वाभाविक तौर प्रतिस्पर्धा दरें प्राप्त होगी परंतु इसमें कई प्रकार के प्रश्न खडे होते है जैसे(कोलन)
१. कौन कौन से आपूर्तिकर्ताओं से निविदाये मंगायी जायें
२. कितने आपूर्तिकर्ताओं से निविदाये मंगायी जायें
३. क्या निविदायें सीधे पत्र भेजकर मंगायी जायें या आम सूचना जारी करके मांगी जाये
४. आम सूचना के प्रसारण का क्या स्तर हो
अंत(कोलन) टेण्डर व्यवस्था के माध्यम से प्रापण करने से पहले यह आकलन करना आवश्यक है कि क्या टेण्डर ब्यवस्था से हमें वास्तव में तुलनात्मक कम मूल्य प्राप्त होगा या इस व्यवस्था से फैसला लेने से अनावश्यक कार्य करना पड़ेगा । अंत(कोलन) सभी तथ्यों को समग्र रूप से विशलेषण करने पर ही कोई निर्णय लिया जा सकता है
भारतीय रेल के संदर्भ में भण्डार संहिता के पैरा ३२३ के अनुसार सुस्थापित निर्माताओ / आपूर्तिकर्ताओ से निविदायें जारी करके प्रतिस्पर्धी कोटेशन प्राप्त की जानी चाहिए मद की प्रकृति, आपूर्ति का स्रोत, कार्य का श्रेत्र तथा अन्य तथ्यों के आधार पर विभिन्न प्रकार की टेण्डर व्यवस्था अपनायी जाती है, महाप्रबन्धक इस हेतु सक्षम है कि किन्ही विशेष परिस्थितियों में जहां उचित कारण हों तो निबिदायें नहीं आंमत्रित करने का फैसला ले सकते है । वर्तमान में टेण्डर व्यव्स्था के अंर्तगत टेण्डर जारी करने की सक्षमताएं आगामी पैरा में बतायी गयी हैं इससे पूर्व विभिन्न प्रकार के टेण्डर के बारे में जान लेना आवश्यक है, यें निम्नलिखित है (कोलन)
१. एकल निविदा (कोलन)ज़ब केवल एक ही फर्म से निविदा आमंत्रित की जाय तो इसे एकल निविदा पद्धति कहते हैं । प्राय(कोलन) यह पद्धति एकाधिकृत वस्तुओं के मामले में अपनाई जाती है । कई बार अत्याधिक आवश्यकता अथवा आपातकालीन स्थितियों में अपनाई जाती है । इस पद्धति में भी प्रापण करने से प्रतिस्पर्धा समाप्त हो जाती है । इसलिए क्रय अधिकारी को अधिक सजकता से कार्य करना पडता है ।
२. साप्ताहिक बुलेटिन निविदा(कोलन) इस पद्धति में भंडार नियंत्रक द्वारा प्रति सप्ताह एक साप्ताहिक बुलेटिन जारी किया जाता है । जिसमें मदों की पूर्ण विवरण, विशिष्टी, मात्रा तथा सुपुर्दगी का स्थान इत्यादि विवरण निविदा संख्या और खुलने की तारीख के साथ दिया जाता हैं । यह् बुलेटिन सभी पंजीकृत फर्मो को जो बुलेटिन के लिए शुल्क दिए हैं, को भेजा जाता है । जिन मदों का मूल्य ५ लाख रूपये से कम होता है उन्हें इस बुलेटिन में डाला जाता है । बुलेटिन की छपाई और वितरण के लिए एक समय सारणी बनाई गई है जिसका कड़ाई से पालन किया जाता है । स्वाभाविक तौर पर यह पद्धति एक प्रकार से सीमित निविदा पद्धति है परंतु इसका प्रसारण मात्र ८१० फर्मों को न होकर सभी पंजीकृत फर्मों को होने से प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है ।
३. सीमित निविदा पद्धति (कोलन) इसमें सीमित संख्या में आपूर्तिकर्त्ताओं से निविदाएँ आमंत्रित की जाती हैं । इसे भी अनुमानित मूल्य ५ लाख रूपये से कम के मामले में अपनाया जाता है । यह मूल्य सीमा संरक्षा मूल्यों के मामले में महाप्रबन्धक की अनुमति से बढाई जा सकती है । सीमित निविदा के मामले में यह आवश्यक है कि इस हेतु उचित कारण मौजूद हो कि खुली निविदाएँ आमंत्रित करना लोक हित तथा खर्च घटाने के पक्ष में न हो । सीमित निविदाएँ उन सभी फर्मों को भेजी जानी चाहिये जो पंजीकृत सूची में हो तथा पिछ्ले सफल आपूर्तिकर्ता को भी अवश्य भेजी जानी चाहिये । आमंत्रित निविदाओं की संख्या ८ से १० के बीच रखी जानी चाहिये । इस हेतु आवश्यक है कि पंजीकृत फर्में काफी अधिक हो तो उनसे बारीबारी से निविदाएँ मँगाई जानी चाहिये । यह भी आवश्यक है कि पंजीकृत फर्मो की अधतन सूची उपलब्ध रहे । जब अंपजीकृत फर्म को आंमत्रित किया जाना आवश्यक हो तो इस हेतु अगले उपरि अधिकारी (न्यूनतम कनिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड) की अनुमति ली जानी चाहिये इस प्रकार हम देखते है कि यह पद्धति वंही अपनाई जानी चाहिये जहाँ सीमित स्त्रोत हो अथवा खुली निविदा करने में खर्च अधिक आता हो
४. खुली निविदा (कोलन) जब आम जनता को विजापन जारी करके निविदाएँ आमंत्रित की जाती है तो इसे खुली निविदा पद्धति कहते है यह व्यवस्था प्राय(कोलन) ५ लाख से अधिक मूल्य के सभी मामलों में अपनाई जाती है परंतु कई बार कम मूल्य वाले मामले में भी अपनाई जाती है जब आपूर्ति के स्रोत के बारे में जानकारी न हो । इसमें निविदाएँ न केवल पंजीकृत ठेकेदारों से आंमत्रित की जाती है बल्कि अन्य व्यवसायिक संस्थाएं जो सूची में न हो उन्हें पूछ्ताछ करने पर और निर्धारित शुल्क का भुगतान करने पर दी जाती हैं । ऐसी संस्था को आदेश देने से पूर्व क्रय अधिकारी को यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वह संस्था उचित तरीके से ठेके को कार्यांवित करने में सक्षम हो । खुली निविदा के मामले में निविदा सूचना का ठीक ठीक प्रकाशन अत्यंत महत्वपूर्ण है निविदा सूचना में मद का संक्षिप्त विवरण, विशिष्ट, सुपुर्दगी का स्थान, बयाना राशि, निरीक्षण की शर्ते तथा निविदा फर्म का मूल्य आदि दिया जाना आवश्यक हैं । इन निविदाओं में निविदा की वैधता ९० दिन रखी जाती हैं तथा एक उचित शर्त होती है कि निवेदित मात्रा को ३०% तक घटाया एवं बढाया जा सकता है । निविदा सूचना का प्रकाशन जनसम्पर्क अधिकारी के माध्यम से प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों में प्रकाशित किए जाने चाहिये । इसके अतिरिवᆬत इस सूचना को इंडियन ट्रेड जनरल में प्रकाशित किया जाना चाहिये और स्थानीय भाषा के समाचार पत्रों में भी इसे दिया जाता है ।
५. वेश्विक निविदा (कोलन) यह पद्धति तब अपनाई जाती है जब देश में प्रतिस्पर्धा कम हो या मद देश में उपलब्ध न हो या कम मात्रा में उपलब्ध हो । इसमें निबिदा का प्रकाशन अंतराष्ट्रीय स्तर किया जाता है तथा निविदा सूचना विभिन्न राजदूतावास तथा व्यापार आयोगो को भी भेजी जाती है इन निविदाओ में क्योंकि बाहर देशो से भी निविदाएँ आती है अंत(कोलन) मूल्यों को स्थानीय करैंसी में परिवर्तित करने के नियम , विनिमय दरों का आधार, निरीक्षण करने वाली संस्था, लैटर ऑफ के माध्यम से भुगतान की व्यवस्था तथा समान परिवहन का प्रकार आदि का अतिरिवᆬत विवरण भी देना आवश्यक है ।
३. निविदा सूचना(कोलन)
इस सूचना में सभी आवश्यक बातों का संक्षिप्त तौर पर विवरण, विशिष्टी , मात्रा, निविदा प्रलेख का मूल्य और मिलने का स्थान आदि दिया जाना चाहिए१ डाक द्वारा प्रलेख मंगाए जाने एवं मूल्य भुगतान की विधि आदि का भी ब्यौरा इसमें होता है । यहां यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि निविदा सूचना का प्रसारण खुलने की स्थिति से ४५ दिन पूर्व आवश्यक है ।
४. निविदा फार्म (कोलन)
निविदा फार्म को जारी करने से पूर्व इसका प्रारुप सक्षम् अधिकारी से अनुमोदित होना चाहिए तथा इसके पशचात कार्यालय अधीक्षक के हस्ताक्षर से जारी किया जाना चाहिए कि निविदा सूचना के प्रकाशित होते ही तुरंत निविदा फार्म उपलब्ध हो जाएं । जब निविदा सूचना वापिस ले ली जाए तो निविदा प्रलेखों का मूल्य वापिस कर दिया जाता है परंतु निविदा खुलने के बाद यदि निविदा निरस्त भी कर दी जाए तो निविदा मूल्य वापिस करने की आवश्यकता नहीं है । सभी लघु उधोग जो राष्ट्रीय लघु उधोग संस्थान से पंजीकृत हो, तो उन्हें पंजीकृत मदो वाली निविदा फार्म निशुल्क जारी किए जाते है । निविदा फार्म को तैयार करते समय निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए क्रेडिट(कोलन)
१. मानक फार्म का प्रयोग किया जाना चाहिए ।
२. मद का विवरण, मात्रा, देय स्थान व निविदा खुलने का समय इत्यादि स्पष्ट रूप से लिखा हो ।
३. जिन मदों के प्रापण में सैम्पल, परीक्षण प्रमाण पत्र, अधिकार प्रपत्र, ड्राइंग, पिछला अनुभव व पैकिंग आदि विवरण महत्वपूर्ण हों तो इसका उल्लेख स्पष्ट रुप से होना चाहिए ।
४. मदों को किसी मानक विशिष्टी के अनुसार खरीदा जाना चाहिए । जहां तक सम्भव हो सैम्पल आदि को आधार नहीं बनाना चाहिए ।
५. मदों के विवरण किसी कम्पनी विशेष के पार्टस या कैटलाग इत्यादि, जहां तक सम्भव हो नहीं होना चाहिए ।
६. निविदा जारी किए जाने के पश्चात् मद के विवरण में परिवर्तन नहीं करना चाहिए ।
७. रिस्क परचेज के मामले में सभी शर्ते मूल निविदा के एकदम समान होनी चाहिए ।
८. कांच व अन्य टूटने वाली मदों के मामले में डिलीवरी गंतव्य स्टेशन पर लेना चाहिए ।
५. निविदाओं का खोलना(कोलन)
भण्डार शाखा में दो प्रकार की निविदाएं खोली जाती हैं सीमित एवं विज्ञापित । इन्हें खोलने के लिए अपनाए गए तरीकों का विवरण निम्न है(कोलन)
सीमित निविदाएं खोलना(कोलन) निविदा बॉक्स को निर्धारित समय पर भण्डार शाखा के प्रतिनिधि द्वारा बंद एवं सील कर दिया जाना चाहिए । नियत समय पर भण्डार शाखा एवं लेखा शाखा के प्रतिनिधियों द्वारा संयुक्त रुप से बॉक्स को खोला जाता है । तुरन्त पश्चात् बॉक्स से प्राप्त सभी लिफाफों को मशीन द्वारा नम्बर एवं तारीख डाल दी जाती है तथा दोनों प्रतिनिधियों द्वारा हस्ताक्षर किए जाते हैं । सभी दरों को लाल स्याही से गोलाकार करके शब्दों में लिख दिया जाता है । सभी वित सम्बन्धी बातों को विशेष रुप से गोलाकार करके लिख दिया जाता है । यदि आँफर में कोई परिवर्तन /बदलाव /कटिगं आदि किया गया हो तो उसे भी दोनो प्रतिनिधियों द्वारा सत्यापित किया जाता है । तत्पश्चात सभी निविदाओं को केस न. के अनुसार छाटा जाता है तथा केसवार रखा जाता है । निविदाओं को केस में यथा १/९, २/९, ३/९ आदि करके रखा जाता है तथा पुन(कोलन) मशीन द्वारा नम्बर लगाया जाता है । तत्पश्चात केस सम्बन्धित क्र्याधिकारी को भेजा जाता है ।
विज्ञापित निविदा खोलना (कोलन) ये निविदाएं भण्डार एवं लेखा शाखा के प्रितिनिधियों द्वारा फर्म के प्रतिनिधियों के समक्ष खोली जाती हैं । जब निविदा खोलने का कार्य एक दिन में पूरा न हो सके तो शेष बचे लिफाफो पर कम से कम दो फर्म प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर कराकर समुचित नोट लिख दिया जाना चाहिए । निविदा खोलते समय फर्म से कोई आँफर या डुपलीकेट कापी आदि नहीं लेना चाहिए । सभी प्राप्त निविदाओं को खोलने के बाद सभी दरों व अन्य वित बातों को लाल स्याही से गोलाकार कर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए । दरों को आवश्यक रुप से शब्दों में भी लिखा जाना चाहिए । खोली जानी वाली निविदाओं को एकएक करके पढ कर सुनाया जाना चाहिए । निविदा खोले जाते समय किसी भी प्रकार का जोडना, घटाना या स्पष्टीकरण आदि नहीं किया जाना चाहिए । खोलने के तुरंत बाद निविदाओं को १/८,२/८, ३/८ आदि के अनुसार क्रम संख्या लिख दी जानी चाहिए । सभी निविदाओं को कैसा फाइल में लगाकर सम्बन्धित को दे दिया जाता है ।
६. निविदाओं का मूल्याकंन (कोलन)
निविदायें खोलने के पश्चात अब ये निर्णय करना होता है कि उचित निविदा को स्वीकृत किया जाए अथवा सभी को निरस्त कद दिया जाए । जब निविदा का मूल्य ५ लाख रुपये से कम होता है तो इसे संबंधित क्रय अधिकारी द्वारा सीधे निर्णीत कर दिया जाता है । जब निविदा मूल्य ५ लाख रुपये से अधिक हो तो उसे एक ३ सदस्यी निविदा समिति द्वारा विचार किया जाता है । इस ३ सदस्यी समिति में भण्डार, मांगकर्त्ता विभाग तथा लेखा विभाग प्रत्येक का एकएक सदस्य होता है । यह समिति सभी प्राप्त निविदाओं को पूर्णत(कोलन) जांच कर अपनी संस्तुति प्रस्तुत करती है जिसे सक्षम अधिकारी द्वारा स्वीकृत किया जाता है । उक्त समिति यह बात ध्यान में रखती है कि स्वीकृत की जाने वाली निविदा तकनीकी रुप से स्वीकार्य हो, दर उचित हो, दर उचित हो और सबसे न्युनतम हो तथा स्वीकृत कार्य का पिछला रिकार्ड संतोषजनक रहा हो । निविदा को स्वीकृत करने से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है(कोलन)
१. सभी निविदाओं को ख'इ घीजौहर्चौह आधार पर तुलना की जानी चाहिए।
२. निविदा में दी गई मद के इतर मद नहीं खरीदनी चाहिए ।
३. यह प्रयास किया जाना चाहिए कि सभी निविदायें उनकी वैधता तिथि के भीतर ही निर्णीत कर दी जाए ।
४. निविदाओं पर फर्म से सभी प्रकार के स्पष्टीकरण बारबार न मांगकर एक ही बार में मांगे जाने चाहिए ।
५. निविदा समिति का स्तर इस बात से तय होगा कि निम्नतम दर वाली निविदा का कुल मूल्य कितना है । यदि निम्न दर वाली ऑफर स्वीकार्य न हो तो केस अगले स्तर की निविदा समिति को सौंप दिया जाता है ।
६. यदि केवल एक ऑफर प्राप्त हुई है तब भी केस निविदा समिति को प्रस्तुत किया जाएगा ।
७. यदि मद की आवश्यकता नहीं रह गई है और केस निरस्त किया जाना अपेक्षित हो तब भी केस निविदा समिति के माध्यम से जांचा जाएगा ।
८. जो अधिकारी निविदा समिति का सदस्य है वह स्वयं स्वीकृत करने के लिए सक्षम नहीं है चाहे उसका मूल्य अधिकार क्षेत्र में हो ।
९. यदि निविदा समिति के सदस्य किसी एक बात पर सहमत न हों तो संबंधित सदस्य अपना असहमति का नोट रिकार्ड कर देगा तथा स्वीकृत करने वाली अधिकारी उचित निर्णय ले सकेगा ।
१०. निविदा समिति को अपनी संस्तुति देते समय सभी शर्ते स्पष्ट रुप से उल्लेख करना चाहिए ।
११. निविदाकर्त्ता द्वारा टैण्डर खुलने के पश्चात् किसी प्रकार का प्रस्ताव/दर/शर्तों में परिवर्तन स्वीकार्य नहीं होगा ।
१२. देरी से प्राइज़ निविदाएं समग्र रुप से निरस्त कर दी जानी चाहिए । जब किन्हीं कारणवश इसे स्वीकार्य करना अपरिहार्य हो तो रेलवे बोर्ड की अनुमति ली जानी चाहिए ।
७. निविदा की स्वीकृति(कोलन)
जब सक्षम अधिकारी द्वारा निविदा स्वीकृत कर दी जाती है तो बिना किसी देरी के आपूर्तिकर्त्ता को आर्डर जारी कर देना चाहिए तथा इसे निविदा की वैधता तिथि में पूरा कर लेना आवश्यक है । जो क्रयादेश रुपये ५०,००० से अधिक के हैं उन्हें लेखाधिकारी द्वारा सत्यापित किया जाना आवश्यक है । फर्म को जारी किये जाने वाले क्रयादेश में निम्न बातों का ध्यान रखना आवश्यक है(कोलन)
१. आदेश स्पष्ट होना चाहिए इसमें दर, टैक्स भुगतान प्रकार निरीक्षण व परिदान अवधि आदि का स्पष्ट (विवाद रहित) उल्लेख होना चाहिए ।
२. विशेष शर्तों का उल्लेख स्पष्ट रुप से होना चाहिए ।
३. जब सुपुर्दगी किश्तों में चाहिए तो तारीखवार जितनी मात्रा चाहिए इसका उल्लेख होना चाहिए ।
४. जब शीघ्र परिदान अवधि के आधार पर अधिक दरों पर क्रयादेश जारी किया गया हो तो इसका स्पष्ट रुप से उल्लेख होना चाहिए कि असफल होने की अवस्था में कम दरें लागू होंगी ।
५. निविदा की स्वीकृति फर्म को भेजी जानी आवश्यक है अन्यथा ठेका लागू नहीं होगा ।
८. टैण्डर व्यवस्था में सुधार के उपाय(कोलन)
किसी भी मद के प्रापण के दो तरीक हैं टैण्डर व्यवस्था अथवा नीलामी व्यवस्था/मदों के प्रापण में नीलामी व्यवस्था उपयुक्त नहीं है क्योंकि इसमें मात्र मूल्य ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि मद की गुणवत्ता व अन्य व्यापारिक शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं और ये सब टैण्डर व्यवस्था से ही सम्भव है । परन्तु टैण्डर व्यवस्था में जो समय लगता है वह कई बार बहुत हतोत्साहित करने वाला होता है तथा इसके प्रसारण में भी धन बहुत खर्च हो जाता है । हालांकि इस व्यवस्था के कई लाभ भी हैं जैसे अज्ञाज श्रोतों का प्रकाश में आना, प्रतिस्पर्धी कीमतें प्राइज़ होना तथा पारदर्शी होना ।
वर्तमान में रेलवे में विज्ञापित निविदा व सीमित निविदा काफी अपनाई जाती है । निविदा के प्रकाशन से लगभग एक से डेढ़ माह का समय निविदाकर्त्ताओं को दिया जाता है । निविदाएं प्राइज़ होने के बाद एक से दो माह का समय उन्हें निर्णीत करने में लग जाता है । निविदा के प्रैस में प्रकाशन पर भी काफी धन व्यय होता है । निविदा के पश्चात् आर्डर जारी कर दिया जाता है । यदि फर्म असफल हो जाती है तो तो पुन(कोलन) प्रापण के लिए पिर टैण्डर व्यवस्था से गुजरना पड़ता है जिसमें लगने वाला समय अत्यन्त हानिकारक होता है ।
उपरोक्त लाभ एवं हानियों को देखते हुए इस टैण्डर व्यवस्था में सुधार हेतु एवं अधिक कारगर बनाने हेतु निम्न सुझाव हैं(कोलन)
१. प्रचलित लिखित/कागजी टैण्डर व्यवथा में इलैक्ट्रानिक टैण्डर प्रणाली अपनाई जानी चाहिए । इस व्यवस्था के बारे में इसी लेख में विस्तृत चर्चा की गई है जिसके अनेक लाभ भी वहां बताए गए हैं ।
२. जहां तक सम्भव हो लम्बी अवधि के रेट कांट्रेक्ट किए जाने चाहिए जिसमें मात्रा को सुगमता से घटाया/बढ़ाया जा सकता है तथा बारबार टैण्डर व्यवस्था से भी बचा जा सकता है ।
३. टैण्डर व्यवस्था तभी अधिक कारगर सिद्ध होगी यदि हमारे वैण्डर विश्वनीय एवं सक्षम हों । इसके लिए फर्म रजिस्ट्रेशन पर बारीकी से ध्यान देने की आवश्यकता है । वैण्डर रेटिंग को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए ।
४. अब चूंकि निविदा प्रकाशन, निविदा फार्म व अन्य सूचनाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं तो निविदा खुलने के लिए प्राय(कोलन) दिया जाने वाला समय ४५ दिन से घटाकर १५२० दिन किया जा सकता है । टैण्डर आकलन भी इलैक्ट्रानिक उपकरणों से शीघ्र किया जा सकता है इससे समय की बचत होगी जिससे इन्वैंटरी होल्डिंग घटेगी ।
५. मदों का अधिक से अधिक मानकीकरण किया जाना चाहिए इससे मदों का प्रापण शीघ्रता से हो सकेगा ।
६. टैण्डर व्यवस्था में निर्णय लेने सम्बन्धी नियमों को अधिक व्यवहारिक तथा लचीला बनाया जाना चाहिए ताकि निविदाएं शीघ्रता से निर्णीत हो सकें ।
९. इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली
भारतीय रेल एक सरकारी संगठन है जिसका क्रय प्रबंधन किसी व्यक्तिगत प्रतिष्ठान से बिल्कुल भिन्न है जिसमें दो बातों का विशेष ध्यान रखा जाता है एक है निष्पक्षता और दूसरी पारदर्शिता । अभी हाल के वर्षों तक इसकी समस्त क्रय प्रणाली इसके कर्मचारी, सम्पूर्ण कार्य हाथों मैनुअली करते रहे जिसके परिणामस्वरूप पर्याप्त मात्रा में मानव श्रम एवं समय की आवश्यकता होती है तथा सामग्री की लागत भी बढ़ जाती है । परन्तु अब देश देश में सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में क्रांति आयी है । बाजार में प्रतियोगिता बढ़ गयी है । प्रणाली को कम्प्यूटरीकृत करके उत्पादकता बढ़ाकर प्रक्रिया में लगने वाले समय को घटाकर लागत कम की जा रही है। अंत(कोलन) सामग्री प्रापण के लिए अब अधिक से अधिक कार्य कम्प्यूटर के माध्यम से किया जाने लगा है । अब हस्तनिर्मित टैंडर के साथ इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली को आरम्भ किया गया है जिससे कि पूरी व्यवस्था मैनुअल टैंडर प्रणाली के स्थान पर इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली को अंगीकृत किया जा सके ।
१०. इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली क्यों
इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली जिसे संक्षेप में ई प्रापण प्रणाली ई. प्रोजेक्ट सिस्टम कहते हैं, के लाभ को जानने से पहले परम्परागत हस्तनिर्मित टैंडर प्रणाली को, इसकी सीमाओं को और कमियों को जान लेना उचित होगा ।
प्रचलित हस्तनिर्मित मैनुअल निविदा प्रणाली (कोलन)
सामग्री क्रय हेतु प्रचलित मैनुअल निविदा प्रणाली रेल विभाग में प्रचलित एक अत्यंत सक्षम एवं सुव्यवस्थित प्रणाली है । इसका अर्थ यह भी नहीं है कि इसमें सारे कार्य हाथों से ही होता है कम्प्यूटर का बिल्कुल ही प्रयोग नहीं है वरन यह एक मिली जुली व्यवस्था है जिसमें यथा सम्भव कम्प्यूटर का भी प्रयोग किया जाता है ।
रेल विभाग में सामान्यत(कोलन) निम्न प्रकार की निविदायें की जाती है (कोलन)
१. खुली निविदा/विज्ञापित निविदा
२. भौगोलिक निविदा
३. बुलेटिन निविदा
४. सीमित निविदा
५. विशेष सीमित निविदा
६. एकल निविदा/पी.ए.सी. निविदा
निविदाओं के जारी करने में एवं भंडार सामग्री के क्रय हेतु क्रय आदेश जारी करने में निम्न चरणों से गुजरना पड़ता है
१. मांग पत्र/डिमांड तैयार कराना उसको लेखा विभाग से सत्यापित करवाकर प्रधान कार्यालय भेजना ।
२. समस्त डिपो से आये मांग पत्रों को मद के अनुसार एकत्रित करना एवं इसकी चैकिंग करना ।
३. अनुमानित वार्षिक खपत का अनुमोदन ।
४. क्रय को जाने वाली मात्रा एवं निविदा के प्रकार का अनुमोदन ।
५. निविदा तैयार करना एवं इसका अनुमोदन ।
६. निविदा का विज्ञापन ।
७. निविदा की फर्मों को सूचित करना ।
८. निविदा दस्तावेज़ की बिक्री ।
९. टैंडर बॉक्स का खोलना ।
१०. प्राइज़ निविदा प्रस्तावों का मूल्यांकन ।
११. तुल्नात्मक दरों वाली टैबुलेशन शीट तैयार करना एवं लेखा विभाग द्वारा सत्यापित कराना ।
१२. निविदा समिति की बैठक एवं विवरणी तैयार करना ।
१३. निविदा समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट का सक्षम अधिकारी द्वारा अनुमोदन ।
१४. क्रय आदेश तैयार करना एवं लेखा विभाग द्वारा सत्यापित कराना ।
१५. क्रय आदेश जारी करना एवं उसका प्रेषण ।
१६. क्रय आदेश में यदि कोई संशोधन हो उसे जारी करना और उसे फर्मों को भेजना ।
मैनुअल निविदा व्यवस्था में अधिकतर कार्य हाथों द्वारा किया जाता है परन्तु रेलवे में प्रचलित निविदा व्यवस्था अत्यन्त सक्षम एवं सुव्यवस्थित निविदा प्रणाली है । इसको प्रभावित करने वाले कारक इस प्रकार हैं ।
१. समय की बचत
२. मानवश्रम की बचत
३. पारदर्शिता
४. निष्पक्षता
५. परिपूर्णता/एक्युरेसी
६. धन की बचत
ध समय की बचत के संबंध में इसका निर्धारण इसके टैंडर के प्रकार पर निर्भर करता है । विज्ञापित निविदा के खोलने में लगभग ६० दिन, बुलेटिन निविदा में ५० दिन और सीमित निविदा के खोलने में साधारणतया ३० दिन का समय दिया जाता है । जिसमें प्रपत्र तैयार करना, इसका विज्ञापन, प्रेषण यदि कोई संशोधन हो जारी करना, फर्मों द्वारा निविदा दस्तावेज़ को खरीदना एवं जमा करना होता है ।
ध टैंडर खोलने, रजिस्टर में दर्ज करने एवं गोपनीय टैंडर सैक्शन में भेजने एवं वहॉं रजिस्टर में दर्ज करने में २ दिन का समय लगता है ।
ध टैंडर प्रस्तावों के तुलनात्मक मूल्यांकन, टैबुलेशन विवरणी तैयार करने एवं लेखा विभाग में सत्यापित करने में २ से ४ दिन का समय लगता है ।
ध टैंडर समिति की बैठक, फर्मों से नैगोसियेशन के उपरान्त उसके मिनटस तैयार करने एवं अग्रिम स्वीकृति भेजने में लगभग १०१२ दिन लगते हैं ।
ध क्रय आदेश जारी करने एवं इसको सत्यापित करने में ३ से ५ दिन की आवश्यकता होती है ।
ध क्रय आदेश भेजने और इसकी प्राप्ति में ७ से १० दिन का समय लग जाता है ।
अंत(कोलन) मैनुअल टैंडर व्यवस्था में टैंडर जारी करने से लेकर क्रय आदेश की प्राप्ति तक २ से ३ माह का समय लग जाता है । किसीकिसी केस में ६ माह या अधिक समय भी लग जाता है ।
मानवश्रम
चूंकि हस्तनिर्मित अर्थात मैनुअल टैंडर प्रणाली में अधिकतर कार्य हाथों से किया जाता है इसलिए इसमें पर्याप्त मानव श्रम की आवश्यकता होती है । यद्यपि एम.एम.आई.एस. लागू होने के बाद काफी मानवश्रम की बचत हुई है फिर भी इसमें काफी मानवश्रम की आवश्यकता होती है ।
पारदर्शिता
मैनुअल टैंडर प्रणाली में चूंकि कर्मचारियों द्वारा अधिकतर कार्य हाथों से किया जाता है अंत(कोलन) सूचना पूर्णरूप से पारदर्शी नहीं होती है ।
निष्पक्षता
इस व्यवस्था में किसी को गुप्त सूचना देकर हेराफेरी की जा सकती है । टैंडर प्रपत्र भेजने से लेकर नैगोसियेशन तक भेदभाव हो सकता है ।
परिपूर्णता/एक्युरेसी
इसमें मानव भूल की सम्भावना बनी रहती है । संबंधित फाईल में क्रय करने से भी रह सकती है इसमें भूल जाने से देरी हो सकती है तथा इसकी गणना एवं शर्तों में भी कमियॉं रह सकती हैं ।
धन की बचत
मैनुअल टैंडर प्रणली में अधिक मानवश्रम लगने से अधिक कर्मचारियों और अधिकारियों की आवश्यकता होती है जिनके वेतन एवं सुविधाओं में खर्च आता है । इसके अतिरिक्त अधिक समय लगने से भी यह प्रणाली अधिक खर्चीली है ।
११. ई. प्रापण व्यवस्था
इलैक्ट्रोनिक प्रापण प्रणाली को संक्षेप में ई. प्रोक्योरमैन्ट प्रणाली या ई.पी.एस. कहते हैं । यह प्रणाली समय की आवश्यकता बन गई है । आज के प्रतियोगी समय में जब हर संगठन अपनी लागत को कम करके प्रतिस्पर्धा का सामना करने का हर सम्भव प्रयास कर रहा है जिससे कि प्रक्रिया में लगने वाले समय को क्रय करके बेहतर सेवा प्रदान कर सके । भारतीय रेल जिसमें लगभग १२००० करोड़ माल सामग्री के प्रापण पर व्यय होता है इसमें किसी भी साधन द्वारा प्रापण में बचत उसे अच्छा परिणाम देता है । ई. प्रापण प्रणाली इस क्षेत्र में एक सार्थक प्रयास है ।
१२. ई.प्रापण प्रणाली क्या है
ई. प्रापण प्रणाली, सामग्री प्रापण हेतु वह कार्य प्रणाली है जिसके अंतर्गत प्रापण मैनुअल के स्थान पर इलैक्ट्रोनिक संसाधनों द्वारा किया जाता है इसलिए इसे ई. प्रापण प्रणाली के नाम से जाना जाता है । पूर्ण रूप से यह प्रणाली लागू होने पर किसी भी सामग्री के लिए मांगपत्र से लेकर क्रय आदेश डालने माल के प्राप्ति निरीक्षण, स्वीकृति एवं भुगतान समस्त कार्य इलैक्ट्रोनिक माध्यम से किये जायेंगे यद्यपि अभी इसका प्रयोग क्षेत्र सीमित है । उत्तर रेलवे में इसका प्रयोग निविदा के अपलोड करने से लेकर निविदा के खोलने एवं टैबुलेशन विवरणी तैयार करने में किया जा रहा है । इसके लिए सर्वप्रथम क्रय करने वाले व्यविᆬत या संगठन एवं आपूर्तिकर्त्ता/ निविदाकार को डिज़ीटल प्रमाण पत्र लेना होता है ।
डिजीटर प्रमाण पत्र
हस्तनिर्मित टैंडर प्रणाली में जारी करने वाला अधिकारी निविदा पर अपना हस्ताक्षर करता है । परन्तु ई. टैंडर प्रणाली के अंर्तगत कोई कागजी कार्यवाही नहीं होती इसमें हस्ताक्षर करने एवं इसको प्रमाणिकता हेतु कुछ सुरक्षा नियम रखने होते हैं जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसमें दोनों पक्ष इसको स्वीकार करने से मुकर तो नहीं जायेंगे । इससे विश्वसनीयता पैदा हो इसलिए एक डिजीटल प्रमाण पत्र जारी किया जाता है । यह डिजीटल प्रमाण पत्र जारी करने वाली संस्था भारत सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियक २००० के अंर्तगत मान्यता प्राप्त होना चाहिये। कंट्रोलर ऑफ अथोरटीज़/ सी.सी.ए के वैबसाईट ुुु.बबच.र्यप.ैह पर यह मान्यता प्राप्त संस्थायें जिसे भारत सरकार द्वारा अधिकृत किया है, इस प्रकार हैं ।
लाईसैंस धारी का नाम १. सेफस्क्रीप्ट ुुु.जचकीजबऍिा.र्बस
२. एन.आई.सी. ुुु.हैब.ैह
३. आई.डी.आर.बी.टी. ुुु.ैगमिाीचर्.यि.ैह
४. टी.सी.एस. ुुु.ाबजबच.ाबज.र्ब.ैह
५. एम.टी.एन.एल. ुुु.साहनाेिजनैही.र्बस
६. कस्टम एवं सैन्ट्रल एक्साईज़ ुुु.ैबीाि.र्यप.ैह
७. एन कोड सल्यूशन सी.ए./ जी.एन.ए.सी ुुु.हर्बगीर्जनर्ोैहज.र्बस
ई. टैंडर प्रणाली में निविदा पद्धति इस प्रकार है(कोलन)
१. निविदा मसौदा तैयार करना
निविदा जारी करने हेतु सक्षम अधिकारी द्वारा निविदा के स्वरूप एवं मात्रा आदि के अनुमोदन के उपरान्त निविदा अपलोड करने हेतु सबसे पहले कम्प्यूटर पर इस वेबसाईट को खोला जाता है जिसमें यह प्रोग्राम निहित है। उत्तर रेलवे की यह वेबसाईट ुुु.ह.ीिॅज.र्बस है इसके खोलने के उपरान्त लॉग इन आई.डी. और पासवर्ड डालकर टैंडर फॉरमेट में पहुंचता है और टैंडर की आवश्यकताओं को अपलोड करता है, इसकी शर्तों और अनुमोदित फर्मों आदि को लोड करता है और इस टैंडर को अटैच कर देता है जिससे यह वेबसाइट पर आ जाता है और अभिक्षुक फर्में इसे देख कर अपना निविदाप्रस्ताव भेज सकती हैं । ध्यान रहे कि इस लोड किये गये टैंडर में यदि जारी करने वाला अधिकारी अपना डिजीटल हस्ताक्षर अपने डिजीटल प्रमाण पत्र के माध्यम से नहीं करता है तो ऐसी स्थिति में ई. टैंडर प्रणाली में इस टैंडर में हस्ताक्षर विचारधीन दिखाया जाता है । टैंडर अपलोड करने के बाद कभीकभी प्रकाश में आता है कि अमुक टैंडर में कोई कमी रह गई है या त्रुटि हो गई है । ऐसी स्थिति में टैंडर के वेबसाईट पर उसमें निहित फार्मेट में संशोधन/सुधार कर दिया जाता है ।
टैंडर लोड करने पर वेबसाइट पर आ जाती है और जिन फर्मों को सूचना देना होता है उनको साईट के माध्यम से सूचना प्राप्त हो जाती है जिसमें वह अन्य व्यवसायिक शर्तें आदि लोड किया जाता है । इसके साथ वह लोड करने वाला व्यविᆬत अपना डिजीटल हस्ताक्षर करता है और टोकन के माध्यम से सर्टीफफकेट इनक्रिप्ट करता है जिससे कि इसके प्रस्ताव को कोई दूसरा व्यविᆬत न पढ़ ले । यह एक प्रकार का सुरक्षा कवच है । फर्म द्वारा टैंडर प्रस्ताव लोड करने के बाद कम्प्यूटर इस टैंडर को अपलोडेड दिखाता है।
जब किसी निविदा के अंतर्गत किसी भी फर्म द्वारा निविदा प्रस्ताव लोड नहीं किया जाता हो इस निविदा में कम्प्युटर टैंडर नॉट रिस्पॉन्ड दर्शाता है । जिसका अर्थ है कि इस निविदा में किसी भी फर्म द्वारा अपना टैंडर प्रस्ताव नहीं भेजा है ।
टैंडर खुलने की निश्चित तारीख एवं समय पर टैंडर के वेबसाइट पर जाकर देखा जाता है कि अमुक निविदा के अंतर्गत फर्मों ने अपना निविदा प्रस्ताव लोड किया है और कम्प्यूटर टैंडर रिस्पॉडेंड दर्शी रहा है । टैंडर खोलने वाले अधिकारी (एक भंडार शाखा और दूसरा लेखा विभाग का अधिकारी्) अपने आई.डी. पासवर्ड और डिजीटल टोकेन के माध्यम से टैंडर खोलता है अपना डिजीटल हस्ताक्षर करता है और इसका प्रिंट लिया जाता है कम्प्यूटर द्वारा इसे अब टैंडर ओपनन्ड दर्शाया जाता है । किन्हीं कारणों से यदि टैंडर समय पर नहीं खोला जाता है तो ऐसी स्थिति में इसे टैंडर पैन्डिग दर्शाया जाता है ।
जबतक हस्तनिर्मित निविदा से पूरा कार्य इलैक्ट्रोनिक निविदा या प्रापण प्रणाली पर स्थानान्तरित नहीं हो जाता है अभी उत्तर रेलवे में यह व्यवस्था मात्र टैंडर तक सीमित है । इस प्रणाली के पूर्ण रूप से लागू करने के लिए फर्मों द्वारा डिजीटल प्रमाण पत्र का लेना अत्यन्त आवश्यक है जिसके अभाव में ये ई प्रापण प्रणाली में भाग नहीं ले सकते हैं । समुचित निविदा प्रस्तावों के अभाव में यह आर्थिक दृष्टि से उपयोगी नहीं होगा क्योंकि पर्याप्त प्रतिस्पर्धा के अभाव में प्रतियोगी रेट नहीं मिल पाता है । अंत(कोलन) इस व्यवस्था को एक साथ लागू नहीं किया जा सका है इसे चरणबद्ध रूप से आरम्भ किया गया है । प्रथम चरण में इनका प्रयोग पी.ऐ.सी. टैंडर या एकल टैंडर प्रणाली में किया गया जिसमें एक ही फर्म के डिजीटल प्रमाण पत्र होने से टैंडर सम्पन्न हो सकता है ।
दूसरे चरण में सीमित टैंडर प्रणाली में इसका प्रयोग किया जा रहा है जिसके अंतर्गत रजिस्टर्ड फर्मों को डिजीट प्रमाण पत्र लेने के लिए प्रोजेक्ट करके यह प्रयोग में लाया जा रहा है ।
तीसरे चरण में बुलेटिन टेंडर और चौथे चरण में विज्ञापित निविदा में इसका प्रयोग किया जाएगा । जब तक प्रर्याप्त मात्रा में फर्मों द्वारा डिजीटल प्रमाण पत्र का प्रबन्ध नहीं कर लिया जाता उत्तर रेलवे द्वारा ई०टेंडर प्रणाली एवं एम०एम०आई०एस० की हस्तनिर्मित मैनुअल टेंडर प्रणाली का मिला जुलाई रुप प्रयोग में लाया जा रहा है । दोनों प्रणाली की निविदाओं में अन्तर के लिए भिन्न भिन्न कार्ड कोड दिये गये हैं जो इस प्रकार है ।
निविदा के प्रकार मैनुअल टेंडर कोड इ टेंडर कोड
खुली निविदा/विज्ञापित निविदा ४० ४१
बुलेटिन निविदा १० ११
सीमित निविदा ३० ३१
विशेष सीमित निविदा २० २१
एकल निविदा ५० ५१
टेंडर खोलने वाले अधिकारी टेंडर खोलने, इसके वैरीफिकेशन एवं निविदा प्रस्तावों के पावती दर्ज करने के बाद एक टैबुलेशन विवरणी का प्रिंट लिया जाता है ।
निविदा शुल्क बयाना राशि अर्नेस्ट मनी धरोहर राशि जमा करना ।
निविदा मूल्य, बयाना राशि अथवा धरोहर राशि जमा करने हेतु फर्मों द्वारा मुख्य कैशियर के पास नकद जमा करके रसीद जमा किया जा सकता है अथवा अपने क्रेडिट कार्ड के माध्यम से गेटवे फैसिलिटी के अन्तर्गत जमा कर सकता है ।
निविदा प्रकमण प्रोसेसिंग एवं निस्तारण(कोलन)
ई टेंडरिंग प्रणाली में पावर्स के अनुसार दी गयी क्रय क्षमता के अनुसार सक्षम अधिकारी द्वारा इसका प्रकमण एवं निस्तारण किया जाता है । उत्तर रेलवे में टेंडर खुलने एवं टैबुलेशन के पश्चात अन्य समस्त कार्य टेंडर मिनट्स तैयार करना, नैगोशियेशन, काउंटर ऑफर, एवं क्रय आदेश डालने, क्रय आदेश के बाद के समस्त कार्य एम०एम०आई०एस० के अन्तर्गत किये जाते हैं । जब ई. प्रापण प्रणाली पूर्ण रुप से लागू हो जाएगी उस समय समस्त कार्य जैसे मांगपत्र, डालने/बनाने से लेकर क्रय करके उसके निरीक्षण स्वीकृति भंडारण एवं भुगतान आदि समस्त कार्य इसी प्रणाली के अन्तर्गत की जाएगी जिसमें जैसे टेंडर अपलोड करने के बाद फर्में उसे डाउनलोट करके टेंडर भर सकती है इसी प्रकार से भंडार शाखा द्वारा क्रय आदेश अपलोड कर दिया जाएगा कोई संशोधन आदि होगा अपलोड किया जाएगा जिसे फर्म डाउनलोड कर सकती है क्रय आदेश की प्रति निरीक्षण अधिकारी अपने वेबसाइट पर देख सकता है कि इस क्रय आदेश के अन्तर्गत अमुक विवरण एवं मात्रा के माल का निरीक्षण करना है । निरीक्षणोपरान्त वह निरीक्षण प्रमाण पत्र भी कम्प्यूटर के माध्यम से जारी करेगा । फर्म माल प्रेषण करके अपना वाउचर इसी प्रणाली से डालेगा । डिपो अधिकारी अपनी स्वीकृति एवं पावती आदेश भी इ प्रणाली के माध्यम से जारी करेगा जिसके अन्तर्गत लेखा विभाग द्वारा उसका भुगतान सीधे उसके खाते में क्रेडिट करके किया जाएगा ।
१३. ईप्रापण प्रणाली के विचार बिन्दु
मैनुअल निविदा प्रणाली एवं इलेक्ट्रानिक निविदा प्रणाली के सम्बन्ध में जान लेने के पश्चात निम्न बिंदुओं पर विचार किया जाना आवश्यक है जिससे इसकी उपयोगिता एवं कमियों पर प्रकाश डाला जा सके(कोलन)
१.समय की बचत
इलेक्ट्रानिक्स प्रापण प्रणाली के अन्तर्गत चूंकि समस्त कार्य कम्प्यूटर के माध्यम से किया जाता है इसमें समय बहुत कम लगता है । यदि ई टेंडर प्रणाली का ही अवलोकन करें जिस टेंडर के खोलने में ५० से ६० दिन का समय लगता है इसे ई टेंडर प्रणाली में ५ से ७ दिन में खोला जासकता है । टेंडर खोलने, टेबुलेशन बनाने और इसकी वेटिंग में जहॉं मैनुअल व्यवस्था में हफ्तों का समय लग जाता है वहीं ई टेंडर प्रणाली में यह कार्य एक दिन में हो जाता है । ई प्रापणप्रणाली पूर्ण रुप से लागू हो जाने के उपरांत वास्तविक समय की बचत का लाभ प्राइज़ होगा । जिस कार्य को मांग पत्र डिमांड जनरेशन डालने से लेकर भुगतान तक ४ से ६ माह लग जाते हैं इसे इस व्यवस्था के अन्तर्गत आधे समय में किया जा सकेगा ।
२. मानव श्रम की बचत
उपरोक्त अनुच्छेद से स्पष्ट है कि इस प्रापण प्रणाली में समय की पर्याप्त बचत होती है इससे निश्चित रुप से मानव श्रम की भी बचत होगी । मांग पत्र बनाने, चेक करने, हस्ताक्षर करने, प्रधान कार्यालय पहुंचाने, समस्त डिपो से आये योग पत्र के समेकित करने वार्षिक अनुमानित खपत पत्र बनाने चेक करने एवं अनुमोदनकरने प्रोविज़निंग एवं टैंडर बनाने अनुमोदन करने, उसके विज्ञापन, संशोधन (यदि कोई हो्) फर्मों को टैंडर भेजने, टैंडर खोलने, रजिस्टर में दर्ज करने टैबुलेशन बनाने, सत्यापित करने, नैगोसियेशन करने कांऊन्टर ऑर देने एवं उसके स्वीकृति को प्राप्ति, टैंडर मिनटस तैयार करने, क्रय आदेश बनाने, इसके सत्यापन एवं जारी करने में, इसके डिस्पैज आदि में कितने ही व्यविᆬतयों की आवश्यकता है और एक ही व्यविᆬत बारबार इसी फाईल में कितने दिन लगाता है परन्तु इसी कार्य को ई प्रापण प्रणाली के अंतर्गत कुछ ही वयविᆬत कर सकते हैं । अंत(कोलन) इस प्रणाली में मानवश्रम की पर्याप्त बचत है ।
३. पारदर्शिता
इस व्यवस्था में चूंकि समस्त कार्य कम्प्यूटर के माध्यम से होते हैं अंत(कोलन) यह व्यवस्था पारदर्शी है । टैंडर के वेबसाइट पर आने के बाद अभिक्षुक कोई भी व्यविᆬत कोई भी व्यविᆬत/फर्म इसकी शर्तों को पूरा कर भाग ले सकती हैं । फर्मों को इस बात का पता लग जाता है कि किस रेट पर किस फर्म को क्रय आदेश पडा है ।
४. निष्पक्षता
यह व्यवस्था पक्षपात रहित है क्योंकि यह पारदर्शी है । इसमें कोई भी व्यविᆬत निहित शर्तों को पूरा करके भाग ले सकता है ।
५. धन की बचत
ई. प्रापण प्रणाली में चूंकि समय एवं मानवश्रम की पर्याप्त बचत होती है । अंत(कोलन) नि(कोलन)संदेह रूप से इसमें धन की बचत होगी ही । यूनाईटिड किंगडम की फर्म जनरल डॉमैस्टिक एम्पलाईसिंस ने इसके माध्यम से लगभग १८ प्रतिशत की बचत की । यूनाइटेड किंगडम के ही मै० एच.जे. हिन्ज जो एक बड़ी खाद्य सामग्री उत्पादक फर्म है ने इलैक्ट्रोनिक रिवर्स ऑक्शन के माध्यम से सामग्री के क्रय में मात्र ३० मिनट में लागत का लगभग १५ प्रतिशत बचत किया । चूंकि बेहतर इन्वैन्टरी कंट्रोल इसके माध्यम से होता है अंत(कोलन) अधिक बचत सम्भव है ।
६. ई. प्रापण प्रणाली में चूंकि प्रापण में समय कम लगता है, इस लिए यह इंवैन्टरी कंट्रोल में अधिक सार्थक है इसके साथ ही माल की आपूर्ति में वांछित सुधार लाती है ।
७. इस प्रणाली के लागू करने पर चूंकि सर्विस लैवल बढ़ जाता है अंत(कोलन) मद की मद स्थिति शून्य होने की संभावना कम होती है ।
८. इसके माध्यम से संचार व्यवस्था एवं फर्मों के ऑफर की प्राप्ति में लगने वाले समय में सुधार हुआ है ।
१४. ई. प्रापण प्रणाली की कमियॉं एवं सीमायें
१. ई. प्रापण प्रणाली में कर्मचारियों का कम्प्यूटर प्रशिक्षित एवं कार्यकुशल होना आवश्यक है बिना सुप्रशिक्षित स्टॉफ के यह लागू नहीं की जा सकती है ।
२. सुमुचित संसाधनों की आवश्यकता होती है जैसे समुचित मात्रा कम्प्यूटर, इंटरनेट कनैक्शन, डिजीटल सर्टिफिकेट आदि ।
३. यही नहीं कि क्रयकर्त्ता के यहॉं ही प्रशिक्षित कार्यकुशल स्टॉफ की आवश्यकता होती है इस व्यवस्था में फर्मों के यहॉं भी पर्याप्त संसाधन और कार्यकुशल स्टॉफ होना आवश्यक है अन्यथा इस व्यवस्था में भाग नहीं ले सकते ।
४. अभी भारत में ई. प्रापण प्रणाली पूर्ण रूप से प्रयोग में नहीं आयी इसके बारे में ज्ञान का अभाव है लोगों को इस व्यवस्था को अपनाने में भय है ।
५. चूंकि अभी यह व्यवस्था पूर्ण रूप से प्रयोग में नहीं आयी है फर्मों के यहॉं संसाधनों का अभाव है अथवा पर्याप्त मात्रा में फर्मों ने डिजीटल प्रमाण पत्र नहीं लिया है जिससे प्रतिस्पर्घा की कमी होगी और उचित रूप से लाभप्रद रेट नहीं मिल पायेगा ।
६. कुछ ही फर्में जिन्होंने डिजीटल प्रमाण पत्र ले लिया है, एक रिंग फार्मेशन कर लगी अथवा एक ही व्यविᆬत विभिन्न फर्मों के नाम से डिजीटल प्रमाण पत्र नहीं है, भाग नहीं ले सकती हैं ।
७. आजकल अकसर साइबर क्राईम के बारों में सुना जा रहा है जिसमें इंटरनेट के माध्यम से सूचनाओं की ट्रैकिंग करके दुरूपयोग किया जा सकता है । यद्यपि आज १२० बिट पर यह प्रणाली अभदेय मानी जाती है परन्तु कम्प्यूटर वैज्ञानिकों की राय है कि इसकी सम्भावना करोड़ों में एक है । यह सम्भावना पहली बार में भी तो हो सकती है ।
अपनी उपरोक्त समस्त कमियों के बावजूद ई. प्रापण प्रणाली अत्यन्त उपयोगी व्यवस्था है । भारत में सूचना क्रांति आ गई है अब सूचना प्रौद्योगिकी शहरों में ही नहीं गॉंवों तक फैल गई है । बदलते परिवेश में वैश्विक प्रतिस्पर्धा को देखते हुये यह व्यवस्था अपरिहार्य बन गई हैं जिस संगठन ने जितना अधिक इसका प्रयोग किया और जितनी शीघ्रता से किया उस संगठन के लिए उतना ही लाभदायी होगा । भारत एवं रेल संगठन में इस प्रणाली का भविष्य उज्जवल है