इतिहास के ऑंसू
दो शब्द
दिनकर की राष्ट्रीय कविताओं की तरह उनकी ऐतिहासिक कविताओं की भी देश में खूब प्रसिद्धि हुई, बल्कि एक ओर जहाँ वे राष्ट्र की वीर आत्मा के उद्घोषक माने गये हैं, वहाँ दूसरी ओर अनेक आलोचक उन्हें अतीत के गायक के रूप में भी अभिहित करते रहे है। इधर, उनके कई काव्य-प्रेमियों की ओर से यह सुझाव आता रहा है कि उनकी ऐतिहासिक कविताओं का एक संग्रह अलग भी निकाल दिया जाय तो अच्छा रहे।
यह सुअवसर हमें आज प्राप्त हुआ हौर हम ''इतिहास के आँसूं'' नामक वर्तमान संग्रह को लेकर पाठकों को सेवा में उपस्थित हो रहे हैं, जिसमें '' दिल्ली'' और ''हिमालय'' को छोड़कर दिनकरजी की, प्रायः, सब प्रमुख एंतिहासिक कविताएँ संगृहीत है। इस संग्रह में कुछ नई रचनाएँ भी हैं, जिनमें से ''मगध-महिमा'' नामग पद्य - नाटिका सबसे उल्लेखनीय है। इसकी रचना कवि ने सन् १९४८ ई० में की थी और इसका एकाध जगह अभिनय भी हुआ है। यह नाटिका-काव्य प्रेमियों के द्वारा मजें में अभिनीत की जा सकती है, यद्यपि इसका आनन्द अभिनय तक ही सीमित नही है।
पटना
मार्गशीर्ष
२००८ संवत् प्रकाशक
्लोक
स्वर्गीय डाक्टर काश्ीप्रसादजी जायसवाल
की स्मृति में
विषय-सूची
१ मडग्ल-आह्म ९
२. मगध-महिमा (पद्य-नाटिका) १३
३ अतीत के द्वार पर ३६
४. पाटलिपुत्र की गंगा से. ४३
५. मिथिला ४९
६. वैशाली ५२
७. बाधि-तत्व ५४
८. कलिंग-विजय ५७
९. वसन्त के नाम पर ६९
१०. वैभव की समाधि ७४
व्योम-कुन्जों की परी अयि कल्पने !
भूमि को निज स्वर्ग पर ललचा नहीं :,
रुक न सकती मृत्तिका आकाश में,
शक्ति है तो आ, बसा अलका यहीं।
फूल से तेरे विभूषित अंग है,
और हीरक-ओस का श्रंगार हैः,
धूल में तरुणी-तरुण हम रो रहे,
वेदना का शीश पर गुरु भार है।
अरुण की चिर ज्योति तेरे देश में,
है सुना, उसकी अमिट मुस्कान हैः,
टकटकी अपनी क्षितिज पर है लगी,
निशि गई, हॅंसता न स्वर्ण-विहान है।
व्योम-कुन्जों की सखी, अयि कल्पने !
आ उतर हॅंस ले जरा वन-फूल में:,
रेणुके ! हॅंसने लगे जुगनू, चला,
आज कूकें खॅंडहरों की धूल में !
मंगल-आवाहन
भावों के आवेग प्रबल
मचा रहे उर में हलचल।
कहते, उर के बॉंध तोड़
स्वर-स्त्रोतों में बह-बह अनजान,
तृण,तरु,लता,अनिल,जल-थल को
छा लेंगे हम बनकर गान !
पर, हूॅं विवश, गान से कैसे
जग को हाय, जगाऊॅं मैं ?
इस तमिस्त्र युग-बीच ज्योति की
कौन रागिनी गाऊॅं मैं ?
बाट जोहता हूॅं लाचार :,
आओ स्वरसम्राट् ! उदार।
पल भर को मेरे प्राणों में
ओ विराट् गायक ! आओ :,
इस वंशी पर रसमय स्वर में
युग-युग के गायन गाओ !
वे गायन, जिनको न आज तक
गाकर सिरा सका जल-थल :,
जिनकी तान-तान पर आकुल
सिहर-सिहर उठता उडु-दल।
आज सरित का कल-कल,छलछल,
निर्झर का अविरल झर-झर,
पावस की बूॅंदो की रिमझिम,
पीले पत्तों का मर्मर,
जलधि-सॉंस, पक्षी के कलरव,
अनिल-नाद,अलि का गुन-गुन,
मेरी वंशी के छिद्रों में
भर दो ये मधुस्वर चुन-चुन !
इंगित करो, बॉंसुरी में से
उठें प्रभाती राग महान :,
तीनों काल ध्वनित हों स्वर में,
जागे सुप्त भुवन के प्राण !
गत विभूति, भावी की आशा
ले युगधर्म पुकार उठे :,
सिंहों की घन-अन्ध गुहा में
ज्योति-पूर्ण हुंकार उठे।
जिनका लुटा सुहाग, हृदय में
उनके दारुण हूक उठे :,
चीखॅूं यों कि याद कर ऋतुपति
की कोयल रो कूक उठे।
प्रियदर्शन इतिहास कंठ में
आज ध्वनित हो काव्य बने :,
वर्त्तमान की चित्रपटी पर
भूतकाल सम्भाव्य बने।
जहॉं-जहॉं घन-तिमिर हृदय में
भर दो वहॉं विभा प्यारी :,
दुर्बल प्राणों के रन्ध्रों में
देव ! फूॅंक दो चिनगारी।
ऐसा दो वरदान, कला को
कुछ भी रहे अजेय नहीं :,
रजकण से ले पारिजात तक
कोई रूप अगेय नहीं।
प्रथम खिली जो मधुर ज्योति
कविता बन तमसा-कूलों में :,
जो हॅंसती आ रही युगों से
नभ-दीपों, वन-फूलों में :,
सुर-सुर तुलसी-शशि जिसकी
विभा यहॉं फैलाते हैं,
जिसके बुझे कणों को पा कवि
अब खद्योत कहाते हैं :,
उसकी विभा प्रदीप्त करे
मेरे उर का कोना-कोना :,
छू दे यदि लेखनी, धूल भी
चमक उठे बनकर सोना !
मगध महिमा
(पद्य-नाटिका)
दृश्य १
(नालन्दा का खॅंडहर : गैरिक वसन पहने हुए कल्पना खॅंडहर के
भग्न प्रचीरों की ओर जिज्ञासा से देखती हुई गा रही है।)
कल्पना का गीत
यह खॅंडहर किस स्वर्ण-अजिर का ?
धूलों में सो रहा टूटकर रत्नशिखर किसके मन्दिर का ?
यह खॅंडहर किस स्वर्ण-अजिर का ?
यह किस तापस की समाधि है ?
किसका यह उजड़ा उपवन है ?
ईंट-ईंट हो बिखर गया यह
किस रानी का राजभवन है ?
यहॉं कौन है, रुक-रुक जिसको
रवि-शशि नमन किये जाते हैं ?
जलद तोड़ते हाथ और
ऑंसू का अर्ध्य दिये जाते हैं ?
प्रकृति यहॉं गम्भीर खड़ी
किसकी सुषमा का ध्यान रही कर ?
हवा यहॉं किसके वन्दन में
चलती रुक-रुक, ठहर-ठहर कर ?
है कोई इस शून्य प्रान्त में
जो यह भेद मुझे समझा दे,
रजकण में जो किरण सो रही
उसका मुझको दरस दिखा दे ?
(नेपथ्य से इतिहास उत्तर देता है।)
इतिहास के गीत
१
कोमले ! धीरे-धीरे गा !
यह टूटा प्रासाद सिद्धि का, महिमा का खॅंडहर है :,
ज्ञानपीठ यह मानवता की तपोभूमि उर्वर है।
इस पावन गौरव-समाधि को सादर शीश झुका।
कोमले ! धीरे-धीरे गा !
२
मैं बूढ़ा प्रहरी उस जग का
जिसकी राह अश्रु से गीली :,
मुरझा कर ही जहॉं शरण
पाती दुनिया की कली फबीली।
डूब गई जो कभी चॉंदनी
वही यहॉं पर लहराती है :,
उजड़े वन, सूखे समुद्र,
डूबे दिनमणि मेरी थाती हैं।
मैं चारण हूॅं मृतक विश्व का,
सब इतिहास मुझे कहते हैं :,
सिंहासन को छोड़ लोग
मेरे घर आते ही रहते हैं।
धूलों में जो चरण-चिह्न हैं,
पत्थर पर जो लिखी कभी है,
मुझे ज्ञात है, इस खॅंडहर के
कण-कण में जो छिपी व्यथा है।
ईंटों पर जिनकी लकीर,
पत्थर पर जिनकी चरण-निशानी
जिनकी धूल गमकती मह-मह,
उन फूलों की सुनो कहानी।
यहीं मगध में कहीं एक थी
उरुवेला वनभूमि सुहावन :,
जिसे देख रम गया तपस्या में
गौतम सन्यासी का मन।
छह वर्षों तक घोर तपस्या की,
पर, तत्व नहीं लख पाये :,
अमृत खोजने को निकले थे,
पर, तप से न उसे चख पाये।
कृश हो गई देह अनशन से,
अति दुष्कर तप करते-करते :,
रही अस्थि भर शेष, तथागत :,
बचे किसी विधि मरते-मरते।
बरगद के नीचे बैठे थे
सोच रहे, अब कौन राह है :,
तप से शक्ति क्षीण होती है,
सम्मुख यह सागर अथाह है।
ऐसे में, ले स्वर्ण-पात्र में
पावन खीर सुजाता आई :,
वट-वासी देवता - सदृश
उसको कृश गौतम पड़े दिखाईं।
अंचल से पद पोंछ, चढ़ा कर
धूप, दीप, अक्षत, फल, रोली :,
सम्मुख थाल परोस, देवता से
कर जोड़ सुजाता बोली।
(पट - परिवर्तन)
(सुजाता ने अपने ग्राम के वट-देवता से यह मांगा था कि अगर मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो तो मैं तुझे खीर खिलाऊंॅंगी। उसे पुत्र हुआ और जिस दिन वह वटवृक्ष की खीर चढ़ाने वाली थी, ठीक उसी दिन, गौतम उसी वृक्ष के नीचे आ विराजमान हुए, जिससे सुजाता ने यह समझा कि वट-देवता ही देह धरकर वृक्ष के नीचे बैठ गये हैं।)
दृश्य २
(उरुवेला की भूमि : बरगद के पेड़ के नीचे कृशकाय गौतम विराजमान हैं :, सामने सोने की थाल में खीर परोसी हुई है : आरती जल रही है : धूप का धुऑं उठ रहा है : सामने सुजाता प्रार्थना कर रही है।)
सुजाता का गीत
हमारे पूरे ज्यों मन-काम।
पूर्ण करें वट-देव ! तुम्हारी भी इच्छा त्यों राम।
हमारे पूरे ज्यों मन-काम।
जैसे आसमान में तारे,
फूलें त्यों संकल्प तुम्हारे,
अन्धकार में उगो, देवता ! तुम शशि-सूर्य-समान।
जग को स्नेह-सलिल से सींचो,
जीव-जीव पर अमृत उलीचो,
रहे उजागर नाम तुम्हारा देश-देश, प्रति धाम।
भरी गोद मेरी यह जसे,
पूर्णकाम तुम भी हो वैसे,
मिला मुझे ज्यों तोष देव ! त्यों मिले तुम्हें उपराम।
हमारे पूरे ज्यों मन-काम।
(सुजाता की यह शुभैषणा पूर्णरूप से चरितार्थ हुई, क्योंकि उसी की खीर खाने के बाद बोधि वृक्ष के नीचे गौतम ने वह गहरी समाधि लगाई जिसमें उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ। कहते हैं, सुजाता के मुख से यह आशीर्वाद सुनकर भगवान अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा कि जब तक तुम-सी भोली नारि मौजूद है, तब तक मुझे भी सफलता की आशा है।)
गौतम का गीत
तुम्हारे हाथों की यह खीर।
मॉं ! बल दे, मैं तोड़ सकूॅं भव की दारुण जंजीर।
तुम्हारे हाथों की यह खीर।
यहॉं जन्म से मरण-काल तक केवल दुख-ही-दुख है :,
वह भी है निस्सार, दीखता जहॉं-तहॉं जो सुख है।
फूलों-सा दो दिन हॅंसकर झर पड़ता मनुज-शरीर।
तुम्हारे हाथों की यह खीर।
मैं हूॅं कौन ? कौन तुम ? हम दोनों में क्या नाता है ?
खेल-खेल दो रोज, मनुज फिर चला कहॉं जाता है ?
सता रहे हैं मुझे, जननि ! ये प्रश्न गहन-गंभीर।
तुम्हारे हाथों की यह खीर।
खोज रहा हॅूं जिसे, अमृत की अगर मिली वह धार :,
नर के साथ देवताओं का भी होगा उद्धार।
हैं जल रहे अदृश्य आग में तीनों लोक अधीर।
तुम्हारे हाथों की यह खीर।
रवि-सा उगूॅं तिमिर में, सच ही, यह मेरी अभिलाषा,
आज देखकर तुम्हें विजय की हुई और दृढ़ आशा।
आशिष दो, ला सकूॅं जगत के मरु में शीतल नीर।
तुम्हारें हाथों की यह खीर।
(पट - परिवर्तन)
दृश्य ३
(प्रथम दृश्य की आवृत्ति : कल्पना खड़ी सुन रही है :
इतिहास नेपथ्य के भीतर से गाता है।)
इतिहास के गीत
१
सुधा-सर का करते सन्धान।
उरुवेला में यहीं कहीं विचरे गौतम गुणवान !
बैठे तरुतल यहीं लगा मुनि सहस्त्रार में ध्यान :,
यहीं मिला बुद्धत्व, तथागत हुए यहीं भगवान।
सुधा-सर का करते सन्धान।
२
कल्पने ! पूछ न कोई बात !
यह मिट्टी वह, खिला धर्म का कमल जहॉं अवदात :,
फूटा जहॉं मृदुल करुणा का पहला दिव्य प्रपात।
कल्पने ! पूछ न कोई बात !
कल्पना का गीत
कौन है इस गह्वर के पार ?
रजकण में यह लोट रहा किस गरिमा का श्रृंगार ?
कौन है इस गह्वर के पार ?
धूल फूल-सी मह-मह करती,
चारों ओर सुरभि है भरती,
उपवन था वह कौन यहॉं जो हुआ सुलग कर क्षार ?
कौन है इस गह्वर के पार ?
जन-रव का मुकुलित कल-कल है,
तिमिर - कक्ष में कोलाहल है,
झनक रही है अन्धकार में यह किसकी तलवार ?
कौन है इस गह्वर के पार ?
दीपित देश-विदेश अभी भी,
विभा विमल है शेष अभी भी,
जला गया यह अमर धर्म का दीपक कौन उदार ?
कौन है इस गह्वर के पार ?
(नेपथ्य के भीतर से इतिहास गाता है।)
इतिहास के गीत
१
कल्पने ! धीरे-धीरे बोल !
पग-पग पर सैनिक सोता है, पग-पग सोते वीर,
कदम-कदम पर यहॉं बिछा है ज्ञानपीठ गंभीर।
यह गह्वर प्राचीन अस्तमित गौरव का खॅंडहर है !
सूखी हुई सरित् का तट यह उजड़ा हुआ नगर है।
एक-एक कण इस मिट्टी का मानिक है अनमोल।
कल्पने ! धीरे-धीरे बोल !
२
यह खॅंडहर उनका जिनका जग
कभी शिष्य और दास बना था :,
यह खॅंडहर उनका, जिनसे
भारत भू-का इतिहास बना था।
कहते हैं पा चन्द्रगुप्त को
मगध सिन्धुपति-सा लहराया,
राह रोकने को पश्चिम से
सेल्यूकस सीमा पर आया।
मगधराज की विजय-कथा सुन
सारा भारतवर्ष अभय हो :,
विजय किया सीमा के अरि को,
राजा चन्द्रगुप्त की जय हो।
(पट-परिवर्तन)
दृश्य ४
(मगध की राजधानी का राजपथ : जहॉं-तहॉं फूलों के तोरण और बन्दनवार सजे हैं : ठौर-ठौर पर मंगल-क्लश रखे हुए हैं तथा दीप जल रहे हैं : सड़क के दोनों ओर के महल भी सुसज्जित दीखते हैं : रास्ते पर नागरिक आनन्द की मुद्रा में आ रहे हैं-जा रहे हैं। नागरिकों का एक दल गाता हुआ प्रवेश करता है।)
नागरिकों का गीत
सब : जय हो, चन्द्रगुप्त की जय हो !
एक : जय हो उस नरवीर सिंह की, जिसकी शक्ति अपार,
जिसके सम्मुख कॉंप रहा थर-थर सारा संसार।
मेरिय-वंश अजय हो !
सब : चन्द्रगुप्त की जय हो !
दूसरा : जय हो उसकी, हार खड़ा जिसके आगे यूनान,
जिसका नाम जपेगा युग-युग सारा हिन्दुस्तान।
दिन-दिन भाग्य-उदय हो !
सब : चन्द्रगुप्त की जय हो !
कोर : जय हो बल-विक्रम-निधान की,
जय हो भारत के कृपाण की,
जय हो, जय हो मगधप्राण की !
सारा देश अभय हो :,
चन्द्रगुप्त की जय हो !
तीसरा : गली-गली में तुमुल रोर है, घर-घर चहल-पहल है :,
जिधर सुनो, बस, उधर मोद-मंगल का कोलाहल है।
पहला : घर-घर में, बस, एक गान है, सारा देश अभय हो !
घर-घर में, बस, एक तान है, चन्द्रगुप्त की जय हो !
(नेपथ्य में शंखध्वनि होती है।)
दूसरा : देख रहे क्या वहॉं ? शंख जय का वह उठा पुकार :,
मगधराज का शुरू हो गया, स्यात्, विजय-दरबार !
चौथा : हॉं, राजा जा चुके, जा चुके हैं चाणक्य प्रवीण,
सेल्यूकस के साथ गया है पण्डित एक नवीन।
पॉंचवॉं : और सुना, यह खास बात कहती थी मुझसे चेटी,
सेल्यूकस के साथ गई है सेल्यूकस की बेटी।
सब : चलो, चलें, देखें दरबार !
चलो, चलें : चलो, चलें !
(सब जाते हैं।)
(पट-परिवर्तन)
दृश्य ५
(चन्द्रगुप्त का राजदरबार : सेल्यूकस, सेल्यूकस की युवती कन्या और मेगस्थनीज एक ओर बैठे हैं : चन्द्रगुप्त, चाणक्य और सभासद् यथास्थान। चौथे दृश्य वाले नागरिक भी आते हैं।)
एक नागरिक : (आपस में कानोंकान)
हैं महाराज खुद बोल
मत हिलो - डुलो,
चुपचाप सुनो !
चन्द्रगुप्त
मगध राज्य के सभासदो ! पाटलीपुत्र के वीरों !
मगध नहीं चाहता किसी को अपना दास बनाना !
गुरु कहते हैं, दासभाव आर्यों के लिए नहीं है;
मैं कहता हूॅं, मनुजमात्र ही गौरव का कामी है।
मैं न चाहता, हरण करें हम किसी देश का गौरव,
किसी जाति को जीत उसे फिर अपना दास बनायें।
उठी नहीं तलवार मगध की किसी लोभ, लालच से,
और न हम प्रतिशोध-भाव से प्रेरित हुए कभी भी।
न दासभावो आर्यस्य (कौटिल्य का अर्थशास्त्र)।
छिन्न-भिन्न है देश, शक्ति भारत की बिखर गई है;
हम तो केवल चाह रहे हैं उसको एक बनाना।
मृदु विवेक से, बुद्धि-विनय से, स्नेहमयी वाणी से,
अगर नहीं, तो धनुष-बाण से, पौरुष से, बल से भी।
ऋषि हैं गुरु चाणक्य; नीति उनकी हम बरत रहे हैं।
भरतभूमि है एक, हिमालय से आसेतु निरन्तर,
पश्चिम में कम्बोज-कपिश तक उसकी ही सीमा है।
किया कौन अपराध, गये जो हम अपनी सीमा तक ?
अनाहूत हमसे लड़ने क्यों सेल्यूकस चढ़ आया ?
मदोन्मत्त यूनान जानता था न मगध के बल को,
समझा था वह हमें छिन्न, शायद, पुरु-केकय-सा।
वह कलंक का पंक आज धुल गया देश के मुख से
हम कृतज्ञ हैं, सेल्यूकस ने अवसर हमें दिया है।
वीर सिकन्दर के गौरव का प्रतिभू सेल्यूकस था;
आज खड़ा है वह विपन्न, आहत-सा मगध सभा में;
उस बलिष्ठ शार्दूल-सदृश निष्प्रभ, हततेज, अकिंचन,
पर्वत से टकरा कर जिसने नख-रद तोड़ लिये हों;
उस भुजंग-सा जिसकी मणि मस्तक से निकल गई हो;
उस गज-सा जिस पर मनुष्य का अंकुश पड़ा हुआ हो।
सभा कहे, बरताव कौन-सा मगध करे इस अरि से।
प्रमुख सभासद्
महाराज ने कही न ये अपने मन की ही बातें,
यही भाव है मगध देश के धर्मशील जन-जनमें,
नहीं चाहते किसी देश को हम निज दास बनाना,
पर, स्वदेश का एक मनुज भी दास न कहीं रहेगा।
हम चाहते सन्धि; पर, विग्रह कोर्इ्र खड़ा करे तो,
उत्तर देगा उसे मगध का महा खड्ग बलशाली।
सेल्यूकस के साथ किन्तु, कैसा बरताव करें हम,
इसका उचित निदान बतायें गुरु चाणक्य स्वयं ही;
क्योंकि सभा अनुरक्त सदा है उनकी ज्ञान-विभा पर।
चाणक्य
आग के साथ आग बन मिलो,
और पानी से बन पानी,
गरल का उत्तर है प्रतिगरल,
यही कहते जग के ज्ञानी।
मित्र से नहीं शत्रुता और,
शत्रु से नहीं चाहिए प्रीति;
मॉंगने पर दो अरि को प्रेम,
किन्तु, है यह भी मेरी नीति।
शक्ति के मद में होकर चूर
विजय को निकला था यूनान,
एक ही टकराहट में गया
मगध को वह लेकिन; पहचान।
प्रीति जो निकली पीछे झूठ,
भीति क्या ? हम तो हैं तैयार;
चरण फिर-फिर चूमेगी जीत,
मगध की तेज रहे तलवार।
अतः, है सेल्यूकस के हाथ,
मित्रता ले या ले आमर्ष,
खड़ा है लेकर दोनों भेंट
ग्रीस के सम्मुख भारतवर्ष।
सेल्यूकस
सामने नहीं, मंच पर आज
खड़ा है विजयी भारत वीर,
और है मिट्टी पर यूनान,
पराजय की पहने जंजीर।
हमारी बॅंधी हुई है जीभ,
हमारी कसी हुई है ! देह,
भला फिर मैं मॉंगूॅं किस भॉंति
गुणी चाणक्य ! वैर या स्नेह ?
मित्रता या कि शत्रुता घोर,
आपका जो जी चाहे करें,
एक है लेकिन, छोटी बात,
विनय है, उसको मन में धरें।
याद है कल पोरस के साथ
सिकन्दर ने सलूक जो किया ?
चन्द्रगुप्त
धन्य सेल्यूकस ! तुमने खूब
आज गुरुवर को उत्तर दिया।
वीरता का सच्चा बन्धुत्व,
झूठ है हार जीत का भेद;
वीर को नहीं विजय का गर्व,
वीर को नहीं हार का खेद।
किये मस्तक जो ऊॅंचा रहे
पराजय-जय में एक समान,
छीनते नहीं यहॉं के लोग
कभी उस बैरी का अभिमान।
सिकन्दर ही न, और भी लोग
प्रेम करते हैं अरि के साथ।
मगध का कर यह देखो बढ़ा,
बढ़ाओ अब तो अपना हाथ।
(चन्द्रगुप्त सिंहासन पर से अपना हाथ बढ़ाता है : सेल्यूकस दोनों हाथों से उसे थाम लेता है।)
सेल्यूकस
जय हो मगधनरेश ! न था मुझको इसका अनुमान,
आज पराजित है, सचमुच ही, भारत में यूनान।
जय हो, दिन-दिन बढ़े मगध का बल, वैभव, उत्कर्ष,
हुआ आज से सेल्यूकस का भी गुरु भारतवर्ष।
सन्धि नहीं, सम्बन्ध जोड़कर मुझको करें सनाथ,
अर्पित है दुहिता यह मेरी, पकड़ें इसका हाथ।
ग्रीस देश की इस मणि को उर-पुर में रखें सहेज,
सीमा पर के चार प्रान्त देता हूॅं इसे दहेज।
आज्ञा हो तो राजदूत मेगस्थनीज को छोड़,
अब जाऊॅं मैं शेष दिवस काटने ग्रीस की ओर।
(चन्द्रगुप्त सेल्यूकस की पुत्री को उठाकर सिंहासन पर बिठलाते हैं : मेगस्थनीज उठकर राजा को प्रणाम करता है।)
(नागरिकों का कोरस गाते हुए प्रस्थान)
जय हो, चन्द्रगुप्त की जय हो।
जय हो बल-विक्रम-निधान की,
जय हो भारत के कृपाण की,
जय हो जय हो मगधप्राण की,
सारा देश अभय हो,
चन्द्रगुप्त की जय हो।
(गीत दूर पर खत्म होता सुनायी पड़ता है।)
(पट-परिवर्तन)
दृश्य ६
(प्रथम दृश्य की आवृत्ति : सामने कल्पना खड़ी सुन रही
है : नेपथ्य के भीतर से इतिहास गाता है।)
इतिहास के गीत
१
कल्पने ! तब आया वह काल।
उठा जगत में धर्म-तिलक-दीपित भारत का भाल
फिलस्तीन, ईरान, मिस्त्र, तिब्बत, सिंहल, जापान,
चीन, श्याम, सबने भारत के पद पर से गुरु मान।
भींग गई करुणा के जल से धरणी हुई निहाल।
कल्पने ! तब आया वह काल।
२
करुणा की नई झन्कार।
साधना की बीन से निकली अधीर पुकार।
स्नेह मानव का विभूषण, स्नेह जीवन-सार,
सत्य को नर ने निहारा, स्यात् पहली बार।
फट गया अन्तर जयी का देख नर-संहार,
जीतकर भी झुक गयी संकोच से तलवार।
करुणा की नई झन्कार।
३
एक बार कलिंग की करतूत से हो क्रुद्ध,
है कथा कि अशोक कर बैठे भयानक युद्ध।
जय मिली, पर, देख मृतकों से भरा रणप्रान्त,
हो उठा सम्राट् का भावुक हृदय उद्भ्रान्त।
देखकर रणभूमि को नर के रुधिर से लाल,
रात भर रोते रहे निज कृत्य पर भूपाल।
(पट-परिवर्तन)
दृश्य ७
(कलिंग की युद्धभूमि : लाशों से पटी हुई धरती पर फीकी चॉंदनी फैली हुई है : घायल कराह रहे हैं, रह-रह कर ÷÷पानी ! पानी !÷÷ की आवाज आती है। एक ओर जरा ऊॅंची जमीन पर मगध की राजपताका निष्कम्प झुकी हुई है, मानों, वह शर्म से अपना मस्तक नहीं उठा सकती। ध्वजा के दंड से पीठ लगाए हुए सम्राट् अशोक परिताप की मुद्रा में खड़े हैं।)
अशोक के गीत
१
जय की वासने उद्दाम !
देख ले भर ऑंख निज दुष्कृत्य के परिणाम।
रुण्ड-मुण्डों के लुठन में नृत्य करती मीच;
देख ले भर ऑंख धरती पर रुधिर की कीच।
मनुज के पॉंवों-तले मर्दित मनुज का मान,
आदमीयत के लहू में आदमी का स्नान।
जय की वासने उद्दाम !
२
रण का एक फल संहार।
मातृमुख की वेदना, वैधव्य की चीत्कार।
गन्ध से जिनकी कभी होता मुदित संसार,
वे मुकुल असमय समर में हाय, होते क्षार।
देह की जो जय, वही भावुक हृदय की हार,
जीतते संग्राम हम पहले स्वयं को मार।
रण का एक फल संहार।
३
हमने क्या किया भगवान ?
यह बहा किसका लहू ? किसका हुआ अवसान ?
कौन थे, जिनको न जीने का रहा अधिकार ?
कौन मैं, जिसने मचाया यह विकट संहार ?
ऊर्मियॉं छोटी-बड़ी, पर, वारि एक समान।
सत्य ओझल, सामने केवल खड़ा व्यवधान।
हमने क्या किया भगवान ?
४
पापी खड्ग घोर कठोर !
ले विदा मुझसे, सदा को संग मेरा छोड़।
अब नहीं जय की तृषा, फिर अब नहीं यह भ्रान्ति,
अब नहीं उन्माद फिर यह, अब नहीं उत्क्रान्ति।
अब नहीं विकरालता यह शत्रु के भी साथ,
अब रॅंगूॅंगा फिर नहीं नर के रुधिर से हाथ।
जोड़ना सम्बन्ध क्या जय से, दया को छोड़ ?
खोजना क्या कीर्ति अपने को लहू में बोर ?
पापी खड्ग घोर कठोर !
५
गूॅंजे धर्म का जयगान।
शान्ति-सेवा में लगें समवेत तन, मन, प्राण।
व्यर्थ प्रभुता का अजय मद, व्यर्थ तन की जीत,
सार केवल मानवों से मानवों की प्रीत।
मृत्ति पर रेखा विजय की खींचते हम लाल,
मेटता उसको हमारी पीठ-पीछे काल।
पर, विजय की एक भू है और जिसके पास,
मृत्यु जा सकती न, करती है अमरता वास।
ज्योति का वह देश, करुणा की जहॉं है छॉंह,
अबल भी उठते जहॉं धर कर बली की बॉंह।
दृग वही जो कर सके उस भूमि का सन्धान,
जो वहॉं पहुॅंचा सके सच्चा वही उत्थान।
गूॅंजे धर्म का जयगान।
(पट-परिवर्तन)
दृश्य ८
(प्रथम दृश्य की आवृत्ति : कल्पना खड़ी सुन रही है नेपथ्य के भीतर से इतिहास है गाता।)
इतिहास के गीत
१
कल्पने ! जीवन के उस पार।
चमक उठा ऑंखों के आगे एक नया संसार।
प्राणों की जब सुनी प्राण ने करुणा-सिक्त पुकार,
चू करके गिर गयी मुष्टि से स्वयं स्त्रस्त तलवार।
कल्पने ! जीवन के उस पार।
२
दया की हुई जयश्री चेरी।
सकल विश्व में नृप अशोक की बजी धर्म की भेरी।
मैत्री ने मन पर मनुष्य के नयी तूलिका फेरी।
जीवन के पावन स्वरूप की करूणा हुई चितेरी।
दया की हुई जयश्री चेरी।
३
कल्पने ! यह संदेश हमारा।
बसता कहीं परिधि से आगे जीवन का ध्रुवतारा।
पा न सके हम उसे सतह के ऊपर कोलाहल में,
मिला हमें वह जब हम डूबे अपने हृदय-अतल में।
चन्द्रगुप्त-चाणक्य समर्थक-रक्षक रहे स्वजन के,
हीन बन्ध को तोड़ हो गये पर, अशोक त्रिभुवन के।
दो कूलों के बीच सिमटकर सरिताएॅं बहती हैं,
सागर कहते उसे, दीखता जिसका नहीं किनारा।
कल्पने ! यह संदेश हमारा।
(पटाक्षेप)
अतीत के द्वार पर
जय हो, खोलो अजिर - द्वार,
मेरे अतीत ओ अभिमानी !
बाहर खड़ी लिये नीराजन
कब से भावों की रानी !
बहुत बार भग्नावशेष पर
अक्षत - फूल बिखेर चुकी;
खॅंडहर में आरती जला कर
रो - रो तुमको टेर चुकी।
वर्तमान का आज निमंत्रण,
देह धरो, आगे आओ;
ग्रहण करो आकार देवता !
यह पूजा -प्रसाद पाओ।
शिला नहीं, चैतन्य मूर्त्ति पर
तिलक लगाने मैं आयी;
वर्तमान की समर दूतिका,
तुम्हें जगाने मैं आयी।
कह दो निज अस्तमित विभा से,
तम का हृदय विदीर्ण करे;
होकर उदित पुनः वसुधा पर
स्वर्ण - मरीचि प्रकीर्ण करे।
अंकित है इतिहास पत्थरों
पर जिनके अभियानों का,
चरण -चरण पर चिह्न यहॉं
मिलता जिनके बलिदानों का,
गुंजित जिनके विजय - नाद से
हवा आज भी बोल रही,
जिनके पदाघात से कम्पित
धरा अभी तक डोल रही।
कह दो उनसे जगा, कि उनकी,
ध्वजा धूल में सोती है,
सिंहासन है शून्य, सिद्धि
उनकी विधवा-सी रोती है।
रथ है रिक्त, करच्युत धनु है,
छिन्न मुकुट शोभाशाली;
खॅंडहर में क्या धरा, पड़े
करते वे जिसकी रखवाली ?
जीवित है इतिहास किसी विधि
वीर मगध बलशाली का,
केवल नाम शेष हैं उनके
नालन्दा - वैशाली का,
हिमगह्वर में किसी सिंह का
आज मन्द्र हुंकार नहीं,
सीमा पर बजनेवाले धौंसों
की अब धधकार नहीं !
बुझी शौर्य की शिखा हाय
वह गौरव-ज्योति मलीन हुई;
कह दो उनसे जगा, कि उनकी
वसुधा वीर - विहीन हुई।
बुझा धर्म का दीप, भुवन में
छाया तिमिर अहंकारी;
हमीं नहीं खोजते, खोजती
उसे आज दुनिया सारी।
वह प्रदीप जिसकी लौ रण में
पत्थर को पिघलाती है;
लाल कींच के कमल-विजय को
जो पद से ठुकराती है।
आज कठिन नर मेध ! सभ्यता
ने थे क्या विषधर पीले !
लाल कीच ही नहीं, रुधिर के
दौड़ रहे हैं नद - नाले।
अब भी कभी लहू में डूबी
विजय विहॅंसती आयेगी,
किस अशोक की ऑंख किन्तु,
रोकर उसको नहलायेगी !
कहॉं अर्धनारीश वीर वे
अनल और मधु के मिश्रण,
जिनमें नर का तेज प्रखर था,
भीतर था नारी का मन ?
एक नयन संजीवन जिनका,
एक नयन था हालाहल,
जितना कठिन खड्ग था कर में,
उतना ही अन्तर कोमल।
स्थूल देह की विजय आज,
है जग का सफल बहिर्जीवन,
क्षीण किन्तु, आलोक प्राण का,
क्षीण किन्तु, मानव का मन।
अर्चा सकल बुद्धि ने पायी,
हृदय मनुज का भूखा है;
बढ़ी सभ्यता बहुत, किन्तु,
अन्तःसर अब तक सूखा है।
यन्त्र-रचित नर के पुतले का
बढ़ा ज्ञान दिन-दिन दूना,
एक फूल के बिना किन्तु, है
हृदय - देश उसका सूना।
संहारों में अचल खड़ा है
धीर, वीर मानव ज्ञानी;
सूखा अन्तःसलिल, ऑंख में
आये क्या उसकी पानी ?
सब-कुछ मिला नये मानव को,
एक न मिला हृदय कातर;
जिसे तोड़ दे अनायास ही
करूणा की हलकी ठोकर।
÷जय हो÷, यन्त्र-पुरुष को दर्पण
एक फूटने वाला दो;
हृदयहीन के लिए ठेस पर
हृदय टूटने वाला दो।
दो विषाद, निर्लज्ज मनुज यह
ग्लानि - मग्न होना सीखे;
विजय-मुकुट रुधिराक्त पहनकर
हॅंसे नहीं, रोना सीखे।
दावानल - सा जला रहा
नर को अपना ही बुद्धि-अनल,
भरो हृदय का शून्य-सरोवर,
दो शीतल करुणा का जल।
जग में भीतर अंधकार है,
जगो तिमिर - नाशक, जागो,
जागो, मन्त्र -द्रष्टा, जगती के
गौरव ! गुरु ! शासक ! जागो।
गरिमा, ज्ञान, तेज, तप, कितने
सम्बल हाय, गये, खोये;
साक्षी है इतिहास, वीर, तुम
कितना बल लेकर सोये।
÷जय हो÷, खोलो द्वार, अमृत दो,
हे जग के पहले दानी !
यह कोलाहल शमित करेगी
किसी बुद्ध की ही बानी।
पाटलिपुत्र की गंगा से
सन्ध्या की इस मलिन सेज पर
गंगे ! किस विषाद के संग,
सिसक-सिसक कर सुला रही तू
अपने मन की मृदुल उमंग ?
उमड़ रही प्लावित कर प्राणों
को कैसी वेदना अथाह ?
किस पीड़ा के गहन भार से
निश्चल-सा पड़ गया प्रवाह ?
मन के मौन मुकुल से कढ़कर
देवि ! कौन - सी व्यथा अपार
बनकर गन्ध अनिल में मिल
जाने को खोज रही लघु द्वार ?
चल अतीत की रंगभूमि में
स्मृति-पंखों पर चढ़ अनजान
विकल-चित्त सुनती तू अपने
चन्द्रगुप्त का क्या जय-गान ?
घूम रहा पलकों के भीतर
स्वप्नों-सा गत विभव विराट् ?
आता है क्या याद मगध का
सुरसरि ! वह अशोक सम्राट् ?
संन्यासिनी-समान विजन में
धर अतीत गौरव का ध्यान,
रो-रोकर गा रही देवि ! क्या
गुप्त-वंश का गरिमा-गान ?
गूॅंज रहे तेरे इस तट पर
गंगे ! गौतम के उपदेश;
ध्वनित हो रहे इन लहरों में
देवि ! अहिंसा के सन्देश।
कुहुक - कुहुक मृदु गीत वही
गाती कोयल डाली - डाली;
वही स्वर्ण -सन्देश नित्य
बन आता ऊषा की लाली।
तुझे याद है, चढ़े पदों पर
कितने जय-सुमनों के हार ?
कितने बार समुद्रगुप्त ने
धोयी है तुझमें तलवार ?
तेरे तीरों पर दिग्विजयी
नृप के कितने बड़े निशान !
कितनी चक्रवर्त्तियों ने हैं
किये कूल पर अवभृथ-स्नान ?
विजयी चन्द्रगुप्त के पद पर
सेल्यूकस की वह मनुहार,
तुझे याद है, देवि ! मगध का
वह विराट् उज्जवल श्रृंगार ?
जगती पर छाया करती थी
कभी हमारी भुजा विशाल;
बार-बार झुकते थे पद पर
ग्रीक, यवन के उन्नत भाल।
उस अतीत गौरव की गाथा
छिपी उन्हीं उपकूलों में,
र्कीर्ति-सुरभि वह गमक रही
अब भी तेरे वन-फूलों में।
नियति - नटी ने खेल-कूद में
किया नष्ट सारा श्रृंगार;
खॅंडहर की धूलों में सोया
तेरा स्वर्णोदय साकार।
तूने सुख-सुहाग देखा है,
उदय और फिर अस्त, सखी !
देख, आज निज युवराजों को
भिक्षाटन में व्यस्त, सखी !
एक - एक कर गिरे मुकुट,
विकसित वन भस्मीभूत हुआ;
तेरे सम्मुख महासिन्धु
सूखा, सैकत उद्भूत हुआ।
धधक उठा तेरे मरघट में
जिस दिन सोने का संसार,
एक-एक कर लगा दहकने
मगध - सुन्दरी का श्रृंगार;
जिस दिन जली चिता गौरव की,
जय-भेरी जब मूक हुई;
जमकर पत्थर हुई न क्यों,
यदि टूट नहीं दो टूक हुई ?
देवि ! आज बज रही छिपी ध्वनि
मिट्टी में नक्कारों की;
गूॅंज रही झन - झन धूलों में
मौर्यों की तलवारों की।
दायें पार्श्व पड़ा सोता
मिट्टी में मगध शक्तिशाली,
वीर लिच्छवी की विधवा
बायें रोती है वैशाली।
तू निज मानस - ग्रन्थ खोल
दोनों की गरिमा गाती है,
बीचि - दृगों से हेर - हेर
सिर धुन-धुनकर रह जाती है।
+ + +
देवि ! दुखद है वर्तमान का
यह असीम पीड़ा सहना;
कहों सुखद इससे संस्मृति में
है अतीत की रत रहना।
अस्तु, आज गोधूलि-लग्न में
गंगे ! मन्द - मन्द बहना,
गॉंवों, नगरों के समीप चल
दर्द भरे स्वर में कहना।
÷÷सम्प्रति जिसकी दरिद्रता का
करते हो तुम सब उपहास;
वहीं कभी मैंने देखा है
मौर्य-वंश का विभव-विलास।÷÷
मिथिला
मैं पतझर की कोयल उदास,
बिखरे वैभव की रानी हूॅं,
मैं हरी-भरी हिम-शैल-तटी
की विस्मृत स्वप्न-कहानी हूॅं।
अपनी मॉं की मैं वाम भृकुटि,
गरिमा की हूॅं धूमिल छाया;
मैं विकल सान्ध्य रागिनी करुण,
मैं मुरझी सुषमा की माया।
अस्तमित ज्योति की सखी,
नष्ट निधियों की रानी मतवाली,
खॅंडहर में खोज रही अपने
उजड़े सुहाग की हूॅं लाली।
मैं जनक-कपिल की पुण्य जननि
मेरे पुत्रों का महा ज्ञान;
मेरी सीता ने दिया विश्व
की रमणी को आदर्श दान।
मैं वैशाली के आसपास
खॅंडहर की धूलों में अजान,
सुनती हूॅं साश्रु-नयन अपने
लिच्छवि-वीरों के कीर्ति-गान।
नीरव निशि में गण्डकी विमल
कर देती मेरे विकल प्राण;
मैं खड़ी तीर पर सुनती हूॅं
विद्यापति - कवि के मधुर गान।
नीलम-घन गरज - गरज बरसें
रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम अथोर,
लहरें गाती हैं मधु - विहाग,
÷हे हे सखि ! हमर दुखक न ओर।÷
चॉंदनी - बीच धन-खेतों में
हरियाली बन लहराती हूॅं,
आती कुछ सुधि पगली दौड़ो
मैं कपिलवस्तु को जाती हूॅं।
बिखरी लट, ऑंसू छलक रहे,
मैं फिरती हूॅं मारी - मारी;
कण-कण में खोज रही अपनी
खोई अनन्त निधियॉं सारी।
मैं उजड़े उपवन की मालिन,
उठती मेरे हिय विषम हूक;
कोकिला नहीं, इस कुंज-बीच
रह रह अतीत-सुधि रही कूक।
मैं पतझर की कोयल उदास,
बिखरे वैभव की रानी हूॅं;
मैं हरी - भरी हिम-शैल-तटी
की विस्मृत स्वप्न-कहानी हूॅं।
वैशाली
ओ भारत की भूमि वन्दिनी ! ओ जंजीरोंवाली !
तेरी ही क्या कुक्षि फाड़ कर जन्मी थी वैशाली ?
वैशाली ! इतिहास-पृष्ठ पर अंकन अंगारों का,
वैशाली ! अतीत गह्वर में गुंजन तलवारों का।
वैशाली ! जन का प्रतिपालक, गण का आदि विधाता,
जिसे ढूॅंढ़ता देश आज उस प्रजातंत्र की माता।
रुको, एक क्षण पथिक ! यहॉं मिट्टी को शीश नवाओ,
राजसिद्धियों की समाधि पर फूल चढ़ाते जाओ।
डूबा है दिनमान, इसी खॅंडहर में डूबी राका,
छिपी हुई है यहीं कहीं धूलों में राजपताका।
ढूॅंढ़ों उसे, जगाओ उनको जिनकी ध्वजा गिरी है;
जिनके सो जाने से सिर पर काली घटा घिरी है।
कहो, जगाती है उनको वन्दिनी बेड़ियोंवाली,
नहीं उठे वे तो न बसेगी किसी तरह वैशाली।
+ + +
फिर आते जागरण-गीत टकरा अतीत-गह्वर से,
उठती है आवाज एक वैशाली के खॅंडहर से।
करना हो साकार स्वप्न को तो बलिदान चढ़ाओ,
ज्योति चाहते हो तो पहले अपनी शिखा जलाओ।
जिस दिन एक ज्वलन्त वीर तुम में से बढ़ आयेगा,
एक-एक कण इस खॅंडहर का जीवित हो जायेगा।
किसी जागरण की प्रत्याशा में हम पड़े हुए हैं,
लिच्छवि नहीं मरे, जीवित मानव ही मरे हुए हैं।
बोधिसत्व
सिमट विश्व - वेदना निखिल बज उठी करुण अन्तर में,
देव ! हुंकरित हुआ कठिन युगधर्म तुम्हारे स्वर में।
कॉंटों पर कलियों, गैरिक पर किया मुकुट का त्याग,
किस सुलग्न में जगा प्रभो ! यौवन का तीव्र विराग ?
चले ममता का बन्धन तोड़
विश्व की महामुक्ति की ओर।
तप की आग, त्याग की ज्वाला में प्रबोध सन्धान किया,
विष पी स्वयं, अमृत जीवन का तृषित विश्व को दान किया।
वैशाली की धूल चरण चूमने ललक ललचाती है,
स्मृति-पूजन में तप-कानन की लता पुष्प बरसाती है।
बट के नीचे खड़ी खोजती लिये सुजाता खीर तुम्हें;
बोधिवृक्ष-तल बुला रहे कलरव में कोकिल-कीर तुम्हें।
शस्त्र-भार से विकल खोजती रह-रह धरा अधीर तुम्हें।
प्रभो ! पुकार रही व्याकुल मानवता की जंजीर तुम्हें।
आह ! सभ्यता के प्रांगण में आज गरल-वर्षण कैसा !
घृणा सिखा, निर्वाण दिलानेवाला यह दर्शन कैसा !
स्मृतियों का अन्धेर ! शास्त्र का दम्भ ! तर्क का छल कैसा !
दीन, दुखी, असहाय जनों पर अत्याचार प्रबल कैसा !
आज दीनता को प्रभु की पूजा का भी अधिकार नहीं,
देव ! बना था क्या दुखियों के लिए निठुर संसार नहीं ?
धन-पिशाच की विजय, धर्म की पावन ज्योति अदृश्य हुई;
दौड़ो बोधिसत्व ! भारत में मानवता अस्पृश्य हुई।
धूप-दीप, आरती, कुसुम ले भक्त प्रेमवश आते हैं;
मन्दिर का पट बन्द देख ÷जय÷ कह निराश फिर जाते हैं।
शबरी के जूठे बेरों से आज राम को प्रेम नहीं;
मेवा छोड़ शाक खाने का याद पुरातन नेम नहीं।
पर, गुलाब-जल में गरीब के अश्रु राम क्या पायेंगे ?
बिना नहाये इस जल में क्या नारायण कहलायेंगे ?
मनुज-मेध के पोषक दानव आज निपट निर्द्वन्द्व हुए;
कैसे बचें दीन ? प्रभु भी धनियों के गृह में बन्द हुए।
अनाचार की तीव्र ऑंच में अपमानित अकुलाते हैं;
जागो बोधिसत्व ! भारत के हरिजन तुम्हें बुलाते हैं।
जागो विप्लव के वाक् ! दम्भियों के इन अत्याचारों से;
जागो हे जागो तप-निधान ! दलितों के हाहाकारों से;
जागो, गॉंधी पर किये गये नरपशु पतितों के वारों से,
जागो, मैत्री-निर्घोष ! आज व्यापक युगधर्म-पुकारों से।
( सन् १९३३ ई० के लगभग गॉंधीजी जब हरिजनोद्धार-आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए देश का दौरा कर रहे थे, तब पूना, बक्सर और देवघर में तथाकथित सनातनियों की ओर से उन पर वार किये गये थे।)
जागो गौतम ! जागो महान,
जागो अतीत के क्रान्ति-गान !
जागो जगती के धर्म-तत्व !
जागो हे जागो बोधिसत्व !
कलिंग-विजय
१.
युद्ध की इति हो गई; रण-भू श्रमित, सुनसान;
गिरिशिखर पर थम गया है डूबता दिनमान-
देखता यम का भयावह कृत्य,
अन्ध मानव की नियति का नृत्य;
सोचता, इस बन्धु-वध का क्या हुआ परिणाम ?
विश्व को क्या दे गया इतना बड़ा संग्राम ?
युद्ध का परिणाम ?
युद्ध का परिणाम हास, त्रास !
युद्ध का परिणाम सत्यानाश !
रुण्ड-मुण्ड-लुंठन, निहिंसन, मीच !
युद्ध का परिणाम लोहित कीच !
हो चुका जो कुछ रहा भवितव्य,
यह नहीं नर के लिए कुछ नव्य,
भूमि का प्राचीन यह अभिशाप,
तू गगनचारी न कर संताप।
मौन कब के हो चुके रण-तूर्य,
डूब जा तू भी कहीं ओ सूर्य।
छा गया तम, आ गये तारे तिमिर को चीर,
आ गया विधु, किन्तु, क्यों आकृति किये गंभीर ?
और उस घन-खंड ने विधु को लिया क्यों ढॉंक ?
फिर गया शशि क्या लजाकर पाप नर के झॉंक ?
चॉंदनी घन में मिली है छा रही सब ओर,
सॉझ को ही दीखता ज्यों हो गया हो भोर।
मौन हैं चारों दिशाएॅं, स्तब्ध है आकाश,
श्रव्य जो भी शब्द वे उठते मरण के पास।
२.
शब्द ? यानी घायलों की आह,
घाव के मारे हुओं की क्षीण, करुण कराह;
बह रहा जिसका लहू उसकी करुण चीत्कार;
श्वान जिसको नोचते उसकी अधीर पुकार।
÷÷घॅूंट भर पानी, जरा पानी÷÷ रटन, फिर मौन;
घूॅंट भर पानी अमृत है, आज देगा कौन ?
बोलते यम के सहोदर श्वान,
बोलते जम्बुक कृतान्त - समान।
मृत्यु-गढ़ पर है खड़ा जयकेतु रेखाकार,
हो गई हो शान्ति मरघट की यथा सााकार।
चल रहा ध्वज के हृदय में द्वन्द्व,
वैजयन्ती है झुकी निस्पन्द।
जा चुके सब लोग फिर आवास,
हतमना कुछ और कुछ सोल्लास।
अंक में घायल, मृतक, निश्चेत,
शूर-वीरों को लिटाये रह गया रण-खेत।
और इस सुनसान में निःसंग,
खोजते सच्छान्ति का परिष्वंग,
मूर्तिमय परिताप-से विभ्राट्,
हैं खड़े केवल मगध - सम्राट्।
टेक सिर, ध्वज का लिए अवलम्ब,
ऑंख से झर-झर बहाते अम्बु।
भूल कर भूपाल का अहमित्व,
शीश पर वध का लिये दायित्व।
जा चुकी है दृष्टि जग के पार,
आ रहा सम्मुख नया संसार।
चीर वक्षोदेश भीतर पैठ,
देवता कोई हृदय में बैठ।
दे रहा है सत्य का संवाद,
सुन रहे सम्राट् कोई नाद।
÷÷मन्द मानव ! वासना के भृत्य,
देख ले भर ऑंख निज दुष्कृत्य।
यह धरा तेरी न थी उपनीत,
शत्रु की त्यों ही नहीं थी क्रीत।
सृष्टि सारी एक प्रभु का राज,
स्वत्व है सबका प्रजा के ब्याज।
मन कर प्रति जीव का अधिकार,
ढो रही धरणी सभी का भार।
एक ही स्तन का पयस कर पान,
जी रहे बलहीन औ बलवान।
देखने को बिम्ब-रूप अनेक,
किन्तु दृश्याधार दर्पण एक।
मृत्ति तो बिकती यहॉं बेदाम,
सॉंस से चलता मनुज का काम।
मृत्तिका हो या कि दीपित स्वर्ण,
सॉंस पाकर मूर्ति होती पूर्ण।
राज या बल पा अमित अनमोल,
सॉंस का बढ़ता न किंचित् मोल।
दीनता, दौर्बल्य या अपमान,
त्यों घटा सकते न इसका मान।
तू हुआ सब कुछ, मनुज लेकिन, रहा अब क्या न ?
जो नहीं कुछ बन सका, वह भी मनुज है, मान।
हाय रे धनलुब्ध जीव कठोर,
हाय रे दारुण! मुकुटधर भूप लोलूप, चोर।
साज कर इतना बड़ा सामान,
स्वत्व निज सर्वत्र अपना मान।
खड्ग - बल का ले मृषा आधार,
छीनता फिरता मनुज के प्राकृतिक अधिकार।
चरण से प्रभु के नियम को चाप,
तू बना है चाहता भगवान अपना आप।
भौं उठा पायें न तेरे सामने बलहीन,
इसलिए ही तो प्रलय यह हाय! रे हिय-हीन।
शमित करने को स्वमद अति ऊन,
चहिए तुझको मनुज का खून !
क्रूरता का साथ ले आख्यान,
जा चुके हैं, जा रहे हैं प्राण।
स्वर्ग में है आज हाहाकार,
चाहता उजड़ा बसा संसार।
भूमि का मानी महीप अशोक,
बॉंटता फिरता चतुर्दिक् शोक।
बॉटता सुत-शोक औ÷ वैधव्य,
बॉटता पशु को मनुज का क्रव्य।
लूटता है गोदियों के लाल,
लूटता सिन्दूर - सज्जित भाल।
यह मनुज-तन में किसी शक्रारि का अवतार,
लूट लेता है नगर की सिद्धि, सुख, श्रृंगार।
शमित करने को स्वमद अति ऊन,
चाहिए उसको मनुज का खून।
३.
आत्म-दंशन की व्यथा, परिताप, पश्चाताप,
डॅंस रहे सब मिल, उठा है भूप का मन कॉंप।
स्तब्धता को भेद बारम्बार,
आ रहा है क्षीण हाहाकार।
यह हृदय-द्रावक करुण वैधव्य की चीत्कार,
यह किसी बूढ़े पिता की भग्न आर्त पुकार !
यह किसी मृतवत्सला की आह,
आ रही करती हुई दिव-दाह।
आ रही है दुर्बलों की हाय,
सूझता है त्राण का नृप को न एक उपाय।
आह की सेना अजेय विराट,
भाग जा, छिप जा कहीं सम्राट्।
खड्ग से होगी नहीं यह भीत,
तू कभी इसको न सकता जीत।
सामने मन के विरूपाकार,
है खड़ा उल्लंग हो संहार।
षोडशी शुक्लाम्बराएॅं आभरण कर दूर,
धूल मल कर धो रही हैं मॉंग का सिन्दूर।
वीर बेटों की चिताएॅं देख जवलित समक्ष,
रो रहीं मॉंएॅं हजारों पीटती शिर-वक्ष।
हैं खुले नृप के हृदय के कान;
हैं खुले मन के नयन अम्लान।
सुन रहे हैं विहवला की आह,
देखते हैं स्पष्ट शव का दाह।
सुन रहे हैं भूप हो कर व्यग्र,
रो रहा कैसे कलिंग समग्र !
रो रही हैं वे कि जिनका जल गया श्रृंगार,
रो रहीं जिनका गया मिट फूलता संसार ;
जल गई उम्मीद, जिनका जल गया है प्यार;
रो रहीं जिनका गया छिन एक ही आधार।
चूड़ियॉं दो - एक की प्रति गृह हुई हैं चूर,
पूॅंछ गया प्रति गेह से दो - एक का सिन्दूर;
बुझ गया प्रति गृह किसी की ऑख का आलोक,
इस महा विध्वंस का दायी महीप अशोक।
ध्यान में थे हो रहे आघात,
कान ने सुन ली मगर, यह बात;
नाम सुन अपना उसॉंसें खीच,
नाक-भौं, ऑंखें, घृणा से मीच।
इस तरह बोले महीपति खिन्न
आप से ज्यों हो गये हों भिन्न
÷÷विश्व में पापी महीप अशोक,
छीनता है ऑंख का आलोक।÷÷
देह के दुर्द्धर्ष पशु को मार,
ले चुके हैं देवता अवतार;
निन्द्य लगते पूर्वकृत सब काम,
सुन न सकते आज वे निज नाम।
अश्रु में घुल बह गया कुत्सित, निहीन, विवर्ण,
रह गया है शेष केवल तप्त, निर्मल स्वर्ण;
हूक-सी आकर गई कोई हृदय को तोड़,
ठेस से विष - भाण्ड को कोई गई है फोड़।
बह गया है अश्रु बन कर कालकूट ज्वलन्त,
जा रहा भरता दया के दूध से वेशन्त।
दूध अन्तर का सरल, अम्लान,
खिल रहा मुख-देश पर द्युतिमान;
किन्तु, हैं अब भी झणत्कृत तार,
बोलते हैं भूप बारम्बार।
÷÷हाय रे ! गर्हित विजय - मद ऊन
क्या किया मैंने ? बहाया आदमी का खून !÷÷
४.
खुल गई है शुभ्र मन की ऑंख,
खुल गई है चेतना की पॉंख ;
प्राण की अन्तःशिला पर आज पहली बार,
जागकर करुणा उठी है कर मृदुल झनकार।
ऑंसुओं में गल रहे हैं प्राण,
खिल रहा मन में कमल अम्लान।
गिर गया हतबुद्धि-सा थक कर पुरुष दुर्जेय,
प्राण से निकली अनामय नारि एक अमेय;
अर्ध - नारीश्वर अशोक महीप,
नर पराजित, नारि सजती है विजय का दीप।
पायलों की सुन मृदुल झनकार,
गिर गई कर से स्वयं तलवार।
वज्र का उर हो गया दो टूक,
जग उठी कोई हृदय में हूक।
लाल किरणों में यथा हॅंसता तटी का देश,
एक कोमल ज्ञान से त्यों खिल उठा हृद्देश।
खोल दृग, चारों तरफ अवलोक,
सिर झका कहने लगे मानी महीप अशोक।
÷÷हे नियन्ता ! विश्व के कोई अचिन्तय, अमेय !
ईश या जगदीश कोई शक्ति हे अज्ञेय !
हों नहीं क्षन्तव्य जो मेरे विगर्हित पाप,
दो वचन, अक्षय रहे यह ग्लानि, यह परिताप।
प्राण में बल दो, रखूॅं निज को सदैव सॅंभाल,
देव ! गर्व - स्फीत हो ऊॅंचा उठे मत भाल।
शत्रु हो कोई नहीं, हो आत्मवत् संसार,
पुत्र-सा पशु-पक्षियों को भी सकूॅं कर प्यार।
मिट नहीं जाए किसी का चरण-चिह्न पुनीत,
राह में भी मैं चलूॅं पग-पग सजग, सभीत।
हो नहीं मुझको किसी पर रोष,
धर्म्म का गूॅंजे जगत में घोष।
बुद्ध की जय! धर्म्म की जय! संघ का जय-गान,
आ बसें मुझमें तथागत मारजित् भगवान।
देवता को सौंप कर सर्वस्व,
भूप मन ही मन गये हो निःस्व।
५.
और तब उन्मादिनी सोल्लास,
रक्त पर बहती विजय आई वरण को पास।
संग लेकर ब्याह का उपहार,
रक्त - कर्दम के कमल का हार।
पर डिगे तिल भर न वीर महीप,
थी जला करुणा चुकी तब तक विजय का दीप।
बसन्त के नाम पर
१.
प्रात जगाता शिशु-वसन्त को नव गुलाब दे-दे ताली।
तितली बनी देव की कविता वन-वन उड़ती मतवाली।
सुन्दरता को जगी देखकर,
जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं;
मैं भी आज प्रकृति-पूजन में,
निज कविता के दीप जलाऊॅं।
ठोकर मार भाग्य को फोड़ॅूं
जड़ जीवन तज कर उड़ जाऊॅं;
उतरी कभी न भू पर जो छवि,
जग को उसका रूप दिखाऊॅं।
स्वप्न-बीच जो कुछ सुन्दर हो उसे सत्य में व्याप्त करूॅं।
और सत्य तनु के कुत्सित मल का अस्तित्व समाप्त करूॅं।
२.
कलम उठी कविता लिखने को,
अन्तस्तल में ज्वार उठा रे !
सहसा नाम पकड़ कायर का
पश्चिम पवन पुकार उठा रे !
देखा, शून्य कुॅंवर का गढ़ है,
झॉंसी की वह शान नहीं है;
दुर्गादास - प्रताप बली का,
प्यारा राजस्थान नहीं है।
जलती नहीं चिता जौहर की,
मुटठ्ी में बलिदान नहीं है;
टेढ़ी मूॅंछ लिये रण - वन,
फिरना अब तो आसान नहीं है।
समय मॉंगता मूल्य मुक्ति का,
देगा कौन मांस की बोटी ?
पर्वत पर आदर्श मिलेगा,
खायें, चलो घास की रोटी।
चढ़े अश्व पर सेंक रहे रोटी नीचे कर भालों को,
खोज रहा मेवाड़ आज फिर उन अल्हड़ मतवालों को।
३.
बात-बात पर बजीं किरीचें,
जूझ मरे क्षत्रिय खेतों में,
जौहर की जलती चिनगारी
अब भी चमक रही रेतों में।
जाग-जाग ओ थार, बता दे
कण-कण चमक रहा क्यों तेरा ?
बता रंच भर ठौर कहॉं वह,
जिस पर शोणित बहा न मेरा ?
पी-पी खून आग बढ़ती थी,
सदियों जली होम की ज्वाला;
हॅंस-हॅंस चढ़े सीस, आहुति में
बलिदानों का हुआ उजाला।
सुन्दरियों को सौंप अग्नि पर निकले समय-पुकारों पर,
बाल, वृद्ध औ÷ तरुण विहॅंसते खेल गए तलवारों पर।
४.
हॉं, वसन्त की सरस घड़ी है,
जी करता मैं भी कुछ गाऊॅं;
कवि हूॅं, आज प्रकृति-पूजन में
निज कविता के दीप जलाऊॅं।
क्या गाऊॅं ? सतलज रोती है,
हाय ! खिलीं बेलियॉं किनारे।
भूल गए ऋतुपति, बहते हैं,
यहॉं रुधिर के दिव्य पनारे।
बहनें चीख रहीं रावी-तट,
बिलख रहे बच्चे मतवारे;
फूल-फूल से पूछ रहे हैं,
÷÷कब लौटेंगे पिता हमारे ?÷÷
उफ ? वसन्त या मदन-बाण है ?
वन-वन रूप-ज्वार आया है।
सिहर रही वसुधा रह-रह कर,
यौवन में उभार आया है।
कसक रही सुन्दरी-÷आज मधु-ऋतु में मेरे कन्त कहॉं ?
दूर द्वीप में प्रतिध्वनि उठती-÷÷प्यारी, और वसन्त कहॉं ?÷÷
वैभव की समाधि
फूॅंक दे जो प्राण में उत्तेजना,
गुण न वह इस बॉंसुरी की तान में;
जो चकित करके कॅंपा डाले हृदय,
वह कला पाई न मैंने गान में।
जिस व्यथा से रो रहा आकाश यह
ओस के ऑंसू बहाकर फूल में,
ढूॅंढ़ती उसकी दवा मेरी कला
विश्व-वैभव की चिता की धूल में !
कूकती असहाय मेरी कल्पना,
कब्र में सोये हुओं के ध्यान में;
खॅंडहरों में बैठ भरती सिसकियॉं
विरहणी कविता सदा सुनसान में।
हॅस उठी कनक - प्रान्तर में
जिस दिन फूलों की रानी,
तृण पर मैं तुहिन - कणों की
पढ़ता था करुण कहानी।
थी बाट पूछती कोयल,
ऋतुपति के कुसुम-नगर की;
कोई सुध दिला रहा था,
तब कलियों को पतझड़ की।
प्रिय से लिपटी सोई थी,
तू भूल सकल सुधि तन की;
तब मौत सॉंस में गिनती,
थी घड़ियॉं मधु जीवन की।
जब तक न समझ पाई तू
मादकता निज मधुवन की;
उड़ गई अचानक तनु से,
कर्पूर-गंध यौवन की।
वैभव की मुसकानों में,
थी छिपी प्रलय की रेखा;
जीवन के मधु-अभिनव में,
बस इतना ही भर देखा।
निर्भय विनाश हॅंसता था,
सुषमाओं के कण-कण में;
फूलों की लूट मची थी,
माली - सम्मुख उपवन में।
माताएॅं अति ममता से,
अंचल में दीप छिपाती;
थी घूम रही ऑंगन में,
अपने मुख पर इतराती।
पर, विवश गोद से छिनकर,
फूलों का शव जाता था;
औ राजदूत ऑंसू पर,
कुछ तरस नहीं खाता था।
धुल रही कहीं बालाओं,
के नव सुहाग की लाली;
थी सूख रही असमय ही,
कलियों से लदी द्रुमाली।
मैं ढॅूंढ़ रहा था आकुल,
जीवन का कोना-कोना;
पाया न कहीं कुछ केवल,
किस्मत में देखा रोना।
कलिका से भी कोमल पद,
हो गये वन्य-मगचारी;
थे मॉंग रहे मुकुटों में,
भिक्षा नृप बने भिखारी।
उन्नत सिर विभव-भवन के,
चूमते आज धूलों को;
खो रही सैकतों में सरि,
तज चली सुरभि फूलों को।
है भरा समय-सागर में,
जग की ऑंखों का पानी;
अंकित है इन लहरों पर,
कितनों की करुण कहानी।
कितने ही विगत विभव के,
सपने इसमें उतराते ;
जाने, इसके गहवर में,
कितने निज राग गुॅंजाते।
अरमानों के इन्धन में,
ध्वंसक ज्वाला सुलगाकर;
कितनों ने खेल किया है,
यौवन की चिता बनाकर।
दो गज झीनी कफनी में,
जीवन की प्यास समेटे;
सो रहे कब्र में कितने,
तनु से इतिहास लपेटे।
कितने उत्सव-मन्दिर पर,
जम गई घास औ काई;
रजनी-भर जहॉं बजाते,
झींगुर अपनी शहनाई।
यह नियति-गोद में देखो,
भोगल-गरिमा सोती है;
यमुना-कछार पर बैठी,
विधवा दिल्ली रोती है।
खो गये कहॉं भारत के,
सपने वे प्यारे - प्यारे ?
किस गगनांगण में डूबे,
वह चन्द्र और वे तारे ?
जय-दीप्ति कहॉं अकबर के,
उस न्याय-मुकुट मणिमय की ?
छिप गई झलक किस तम में,
भारत के स्वर्ण-उदय की ?
वह मादक हॅंसी विभव की,
मुरझाई किस अंचल में ?
यमुने ! अलका वह अपनी,
डूबी क्या तेरे जल में ?
अपना अतीत वीराना,
भटका फिरता खॅंडहर में;
भय उसे आज लगता है,
आते अपने ही घर में।
बिजली की चमक-दमक से,
अतिशय घबराकर मन में;
वह जला रहा टिमटिम-सा,
दीपक झंखाड़ विजन में।
दिल्ली ! सुहाग की तेरे,
बस, है यह शेष निशानी;
रो-रो पतझड़ की कोयल,
उजड़ी दुनिया की रानी।
कह, कहॉं सुनहले दिन वे,
चॉंदी-सी चकमक रातें ?
कुंजों की ऑंख-मिचौनी,
है कहॉं रसीली बातें ?
साकी की मस्त उॅंगलियॉं,
अलसित ऑंखें मतवाली;
कम्पित, शरमीला चुम्बन,
है कहॉं सुरा की प्याली ?
गूॅंजती कहॉं कक्षों में,
कड़ियॉं अब मधु-गायन की ?
प्रिय से अब कहॉं लिपटती,
तरुणी प्यासी चुम्बन की ?
झॉंकता कहॉं उस सुख को,
लुक-छिप विधु वातायन से ?
फिर घन में छिप जाता है,
मादकता चुरा अयन से ?
वे घनीभूत गायन से,
अब महल कहॉं सोते हैं ?
वे सपने अमर कला के,
किस खॅंडहर में रोते हैं ?
वह हरम कहॉं मुगलों की,
छवियों की वह फुलवारी ?
है कहॉं विश्व का सपना,
वह नूरजहॉं सुकुमारी ?
स्वप्निल विभूति जगती की,
हॅंसता यह ताजमहल है !
चिन्तित मुमताज-विरह में,
रोता यमुना का जल है !
ठुकरा सुख राजमहल का,
तज मुकुट विभव-जल-सींचे;
वह शाहजहॉं सोते हैं,
अपनी समाधि के नीचे।
कैसे श्मशान में हॅंसता
रे ताजमहल अभिमानी ?
दम्पति की इस बिछुड़न पर,
आता न ऑंख में पानी