भण्डारण व्यवस्था
उद्देश्य
रेलवे के विभिन्न विभागों द्वारा मरम्मत, परिचालन एवं अनुरक्षण से सम्बन्धित कार्य के निष्पादन के लिए अपेक्षित सामग्री की मॉग का मूल्यांकन करना, क्रय करना एवं भण्डारित करना ।
उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए रेलवे ने भण्डार विभाग की स्थापना की है जो कि केन्द्रीय रूप में मुख्यालय से भण्डार नियन्त्रक द्वारा नियन्त्रित है । उनकी सहायता के लिए मुख्य सामग्री प्रबन्धक, उप मुख्य सामग्री प्रबन्धक, वरिष्ठ सामग्री प्रबन्धक एवं सहायक सामग्री प्रबन्धक मुख्यालय एवं विभिन्न डिपो में कार्यरत है ।
उत्तर रेलवे स्तर पर संगठनात्मक सारणी निम्न प्रकार से है।
संगठन सारणी
महाप्रबन्धक
भण्डार नियन्त्रक
मुख्य सामग्री प्रबन्धक
प्रधान कार्यालय स्तर पर संगठन डिपो स्तर पर संगठन प्रिटिंग प्रेस
क्रय, इंवेटंरी, बजट इत्यादि प्राप्तियॉ एवं निरीक्षण, टिकटों एवं लेखन सामग्री
भण्डारण, वितरण, इंवेटंरी का मुद्रण एवं आपूर्ति
नियन्त्रण, स्क्रैप निष्पादन
उप मुख्य सामग्री प्रबन्धक उप मुख्य सामग्री प्रबन्धक उपमुख्य प्रबन्धक प्रिटिंग प्रेस
वरिष्ठ सामग्री प्रबन्धक वरिष्ठ सामग्री प्रबन्धक वरिष्ठ प्रबन्धक प्रिटिंग प्रेस
सहायक सामग्री प्रबन्धक सहायक सामग्री प्रबन्धक सहायक प्रबन्धक प्रि0प्रेस
भण्डार नियन्त्रक के कार्य
भण्डार संहिता भाग एक के पैरा 103 के अनुसार भण्डार के सभी उपलब्ध वर्तमान स्टाक वे चाहे भण्डार विभाग या रेल के अन्य विभागों के पास हों, ऐसी धन राशियों के रूप में रखे गये होते है, जो उत्पादक नहीं है । जबकि स्टाक ऐसे होने चाहिए कि रेल की मॉग पर वे तत्काल उपलब्ध हों, उन्हें यथा सम्भव न्यूनतम होना चाहिए और व्यवहारत: बर्बादी तथा ह्रास के कारण उनकी कम से कम क्षति होनी चाहिए इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक केन्द्रीय नियन्त्रण का दायित्व भण्डार नियन्त्रक पर होता है, जो भण्डार विभाग का अध्यक्ष होता है और निम्नलिखित कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है
क) सामानों का क्रय और निरीक्षण
ख) रेल भण्डार का अनुरक्षण और निर्गम
स्टॉक के प्रकार और उनका विवरण:
भंडार संहिता भाग-1 के पैरा 110 के अनुसार रखरखाव और वितरण के लिए भंडार को सामान्य तथा स्थाई रेलपथ भंडार सहित इंजीनियरी भंडार के रूप में विभाजित किया गया है । स्थाई पथ सामग्रियों के स्टॉक के नियंत्रण का संगठन सामान्यतया रेलपथ पूर्ति अधिकारी के रूप में नामांकित अधिकारी के अधीन होता है जो अलग स्थाई रेलपथ पूर्ति डिपो यदि कोई वर्तमान हो के कर्मचारियों के साथ भंडार विभाग की स्वत: पूर्ण शाखा का गठन करता है । रेलपूर्ति अधिकारी भंडार नियंत्रक और मुख्य अभियंता के साथ पूरी तरह सहयोग रखता है ।
भंडार संहिता भाग-1 के पैरा 111 के अनुसार लाइन के उपयुक्त केन्द्रों पर भंडार नियंत्रक के अधीनस्थ डिपो के अधिकारियों के नियंत्रण में सामग्रियॉं संचित की जाती है । इसके साथ अधीनस्थ कर्मचारी वर्ग जैसे रनिंग शेड वरिष्ठ अनुभाग अभियंता, गाड़ी परीक्षक विद्युत अनुभाग अभियंता, वरिष्ठ अनुभाग अभियंता/रेलपथ इत्यादि के लिए उचित स्थान पर भंडार की तात्कालिक आवश्यकता के सामान रखने की भी स्वीकृति होती है ।
भंडार डिपो के कार्यस्थल:
भंडार संहिता भाग-1 के पैरा 112 के अनुसार कार्य की सुविधा के लिए भंडार डिपो के कार्यस्थल सामान्यत: इस प्रकार होते हैं ।
1.रेल के भाप, डीज़ल तथा विद्युत के मुख्य इंजन कारखानों से संलग्न इंजन सामग्रियों के भंडार डिपो ।
2.इसी प्रकार मुख्य सवारी एवं माल डिब्बा कारखानों से संलग्न सवारी तथा माल डिब्बा भंडार डिपो ।
3.सिगनल कारखानों यदि हों के कार्यरत सिगनल भंडार डिपो ।
4.स्थाई पथ तथा पुल सामग्रियों के भंडारण के लिए एक या अधिक स्थाई पथ सामग्री डिपो ।
5.लेखन सामग्री डिपो
6.सभी रद्दी और अनुपयोगी सामानों को एकत्र करके रखने के लिए एक या अधिक भंडार डिपो या यार्ड जो ऐसे या उन स्थानों के निकट हैं जहॉं इस तरह की सामग्रियों के निपटारे के लिए सबसे उत्तम बाजार स्थित हैं ।
7.आवश्यकतानुसार अन्य सामान्य भंडार डिपो बिना महाप्रबन्धक की स्वीकृति के कोई नया भंडार डिपो स्थापित नहीं होता है और इस प्रकार की स्वीकृति अधिकारियों की बैठक के कार्यवृत्त में अंकित होता है ।
भंडार हेतु विभिन्न मदों का मानक वर्गीकरण कर 75 समूहों में विभाजित किया गया है जिसकी समूह संख्या उस समूह से संबंधित किसी मूल्य सूची के प्रथम दो अंकों में दी जाती है । प्रत्येक मद की एक आठ अंक की मूल्य सूची संख्या दी गयी है जिसमें पहला दो अंक मुख्य समूह अगले दो अंक उप समूह तथा अगले तीन अंक क्रम संख्या तथा अन्तिम अंक चैक अंक को दर्शाता है जो कि कम्प्यूटर द्वारा आबंटित किया जाता है तथा इसका प्रयोग यह देखने के लिए किया जाता है कि संख्या सही रूप में लिखी गयी है ।
रेलवे में प्रयुक्त मदों की समूह संख्या एवं उसका विवरण भंडार संहिता भाग-1 पैरा 201 में वर्णित है जो निम्न प्रकार से है ।
समूह संख्या विवरण
वाष्प रेल इंजन के पुर्जे और उपस्कर
00 डब्ल्यू0पी/ डब्ल्यू0जी0/डब्ल्यू0एल0/डब्ल्यू0टी0 ।
01 बड़ी लाइन के भारतीय रेल मानक के अन्य इंजन ।
02 बड़ी लाइन के गैर भारतीय रेल मानक इंजन ।
03 वाई0पी0/वाई0जी0/वाई0एल0/वाई0एम0 ।
04 मीटर लाइन के भारतीय रेल मानक के अन्य वाष्प इंजन ।
05 मीटर लाइन के गैर भारतीय रेल मानक वाष्प इंजन ।
06 छोटी लाइन के सभी वाष्प इंजन ।
07 वाष्प रेल क्रेन- बड़ी लाइन/मीटर लाइन/छोटी लाइन ।
08 डीजल रेल क्रेन/बड़ी लाइन/मीटर लाइन/छोटी लाइन ।
डीजल रेल इंजन के पुर्जे और उपस्कर
10 एल्को/डी0एल0डब्ल्यू0 डीजल विद्युत रेल इंजन/बड़ी लाइन/मीटर लाइन/छोटी लाइन । डब्ल्यू0डी0एम0-1,डब्ल्यू0डी0एम0-2, डब्ल्यू0डी0एस0-5, डब्ल्यू0डी0एम0-4,डब्ल्यू0डी0एम0-4ए, पावर पैक ।
11 1,डब्ल्यू0डी0एम0-2, डब्ल्यू0डी0एस0-5, डब्ल्यू0डी0एम0-4,डब्ल्यू0डी0एम0-4ए वाहन भाग
12 1,डब्ल्यू0डी0एम0-2, डब्ल्यू0डी0एस0-5, डब्ल्यू0डी0एम0-4,डब्ल्यू0डी0एम0-4ए, प्रेषण ।
13 एम0ए0के0/सी0एल0डब्ल्यू0/डीजल हाइड्रोलिक द्रव चालित रेल इंजन-बड़ी लाइन/मीटर लाइन/छोटी लाइन-डब्ल्यू0डी0एस0-4, डब्ल्यू0डी0एस04ए, जेड0डी0एम0-3, पावर पैक ।
14 डब्ल्यू0डी0एस0-4,डब्ल्यू0डी0एस04ए, जे0डी0एम0-3, वाहन भाग ।
15 समूह 10 और 11 दोनों में समान रूप से प्रयुक्त लौह निर्मित मदें ।
16 सामान्य मोटरों वाले डीजल विद्युत रेल इंजन-बड़ी लाइन और मीटर लाइन-डब्ल्यू0डी0एम0-4,वाई0डी0एम0-3,वाई0डी0एम0-5
17 हेन्सकेल मुख्य लाइन डीजल हाइड्रोलिक रेल इंजन डब्ल्यू0डी0एम0-3
19 गैर मानक डीजल रेल इंजन-वाई0डी0एम0-1,एन0/जेड0डी0एम0-1,जेड0डी0एम0-2, डब्ल्यू0डी0एस0-1,डब्ल्यू0डी0एस0-2 ।
विद्युत रेल इंजन पुर्जे और उपस्कर
21 युद्ध पूर्व के डी0सी0 विद्युत इंजन बड़ी लाइन ।
22 युद्ध के बाद के डी0सी0 विद्युत रेल इंजन-डब्ल्यू0सी0एम0-1,2,3,4,5 और डी0सी0जी0-2
23 ए0सी0 रेल विद्युत इंजन-समूह-डब्ल्यू0ए0एम0-1डब्ल्यू0ए0जी0-1डब्ल्यू0ए0जी0-3 डब्ल्यू0ए0जी0-4
24 ए0सी0 विद्युत रेल इंजन जापानी डिज़ाइन डब्ल्यू0ए0एम0-2,डब्ल्यू0ए0एम0-3,डब्ल्यू0ए0जी0-3
25 सी0एल0डब्ल्यू0 के ए0सी0 विद्युत रेल इंजन
27 बड़ी लाइन के ए0सी0/डी0सी0 विद्युत इंजन ।
28 मीटर लाइन के सभी ए0सी0 विद्युत इंजन ।
सवारी डिब्बा,माल डिब्बा,ई0एम0यू0 रेल कार के हिस्से और उपस्कर
30 सवारी डिब्बा कारखाना आई0सी0एफ0 के सवारी डिब्बे-बड़ी लाइन/मीटर लाइन ।
31 आई0सी0एफ0 के ई0एम0यू0 सवारी डिब्बे-बड़ी लाइन/मीटर लाइन।
32 डीज़ल रेल कार- बड़ी लाइन/मीटर लाइन/छोटी लाइन ।
33 बी0ई0एम0एल0 सवारी डिब्बे-बड़ी लाइन/मीटर लाइन ।
34 जेसप- सवारी डिब्बे-बड़ी लाइन/मीटर लाइन ।
35 ई0एम0यू0 सवारी डिब्बे-बड़ी लाइन/मीटर लाइन/जेसप,ब्रेडा इत्यादि
36 अन्य सवारी डिब्बा स्टॉक-बड़ी लाइन/मीटर लाइन ।
37 भारतीय रेल के पुराने मानक आई0आर0एस0 डिज़ाइन के माल डिब्बे सी0आर0,ओ0,एम0बी0सी0,एन0सी0एल0 ।
38 भारतीय रेल के नए मानक स्टॉक माल डिब्बे- बॉक्स,बी0ओ0आई0,बी0सी0एक्स,बी0आर0एच0 तथा आगामी नई डिज़ाइन ।
39 अन्य माल वाहन स्टॉक- जैसे आई0आर0सी0ए0 तथा भारतीय रेल के गैर मानक स्टॉक ।
विद्युत भंडार
40 केबल,चालक और प्रेषण सामग्रियॉं और तार ।
41 विद्युत रोधक और विद्युतरोधी सामग्रियॉं ।
42 विद्युत उपस्कर ।
43 सभी यंत्र औजार और पंर्जा उपकरण ।
45 विद्युत प्रकाशन सेल और गाड़ी की प्रकाश सामग्रियॉं जो कहीं और न शामिल की गई हों ।
46 विद्युत उपकेन्द्र के प्रेषण और वितरण उपकरण जो कहीं और न शामिल किए गए हों ।
47 विद्युत मशीने तथो पुर्जे- जिनमें सभी तरह के कार्बन ब्रस शामिल हैं।
सिगनल और दूर संचार भंडार
50 तार टेलीग्राम और टेलीफोन उपकरण ।
52 बेतार वायरलेस उपकरण – जिसमें इलेक्ट्रानिक उपकरण और संचार के अतिरिक्त पुर्जे शामिल हैं ।
54 सिगनल और इंटरलाकिंग् िफटिंग्स सामग्री, यांत्रिक एकल तार और उनके पुर्जे एवं उपस्कर ।
55 सिगलन और और इंटरलाकिंग िफटिंग सामग्री, दोहरे यॉंत्रिक तार और उनके पुर्जे तथा उपस्कर ।
56 सिगनल और इंटरलांकिग सामग्री, विद्युतीय और उसके पुर्जे तथा उपस्कर ।
इंजीनियरिंग संयंत्र,मशीन और पंर्जे
60 स्थाई रेलपथ रेल मार्ग के औजार और पुल के कार्य में आने वाले उपस्कर ।
61 भवन सामग्रियॉं जिनमें सफाई संबंधी सामान,छत बनाने के सामान जी0आई0शीट के अतिरिक्त ईटें, बालू, सीमेंट,चूना इत्यादि शामिल है ।
62 पाइप, नली ट्यूब के उपस्कार जिनमें वाल्व भी शामिल है ।
65 संयंत्र और मशीन क्रेन की पूरी इकाई सहित ।
66 संयंत्र,मशीन और क्रेन के लिए अतिरिक्त पुर्जे ।
67 रोड मोटरें, स्वचालित ट्रकें, ट्रालियॉं और सामानों के निस्तारण उपकरणों के लिए अतिरिक्त पुर्जे ।
सामान्य भंडार
70 घर्षण और प्रेषण पहिए
71 ब्रस,तारब्रस और तार टोकरी तथा बॉस के सामान ।
72 औजारों की सहायक सामग्रियॉं और पुर्ज और औजार ।
73 लौहर निर्मित वस्तुऍं, कीलक,रिविट,बोल्ट,नट,पेचकश,दुपेचा और पिन तथा पन्नी ।
74 लौह निर्मित वस्तुऍं कीलक-लौह एवं पिन निर्मित वस्तुओं को छोड़कर विस्फारित धातु,तेल की बत्तियॉं,पुर्जे और उपस्कार भंडार इत्यादि, तार की रस्सियॉं, जंजीरें तथा अन्य सामान उपस्कर सम्मिलित हैं ।
75 भारतीय रबड़, चमड़ा, कनवास तथा प्लास्टिक और तकनीकी वर्गीकरण के पदार्थों को छोड़कर इसी तरह की सामग्रियां ।
76 विद्युत छड़ कटनी झलाई की सहायक सामग्रियां बिजली और आक्सीजन वाली ।
77 रंग रोगन, कलई तथा मीनाकारी के सामान वार्निश और रंगसाज के लिए तेल एवं स्पिरिट सहित रंगसाज के सामान ।
78 चीनी मिट्टी के बर्तन, धूरी कॉटा, गमछा तौलिया एवं मेजपोस इत्यादि, रसोई और मेज की साजसज्जा के सामान, पर्नीचर तथा अन्य उपकरण घंटा घड़ी इत्यादि ।
79 कपड़ा, पोशाक तथा अन्य वैयक्तिक प्रयोग के सामान और सूती कपड़े के सामान, जैसे मोटी डोरी वाला कपड़ा, डोरियॉ और सूती कपड़े ।
80 ईधन के तेल के अतिरिक्त अन्य पेट्रोल तथा पेट्रोल निर्मित पदार्थ ।
81 साबुन, रोगाणुनाशक, कीटनाशक तथा विस्पोटक पदार्थो सहित तेजाब, रसायन तथा रसायन से बनी वस्तुएं, और वनस्पति तेल ।
82 दवाइयॉ, औषधीय वस्तुएं, चिकित्सालय सम्बन्धी उपस्कर और औजार ।
83 लेखन सामग्री, प्रपत्र, अनुरेखन कार्यालय के उपकरण, प्रयोगशाला के यन्त्र, पोटोग्रापी के उपकरण और मुद्रण सम्बन्धी प्रेस के उपकरण ।
84 उष्मसह सामान, शीशा के प्रतिस्थापक पदार्थ,ऐसवेस्टस, ऐसवेस्टस तन्तु जोड़ और पैकिंग की सामग्रियॉ ।
85 बेयर्रिग बाल और रोलिंग
86 विविध सामान, जिनमें अग्नि शामक उपकरण और समुद्री जहाज के सामान शामिल है ।
90 लौह निर्मित धातु सामग्रियॉ ।
91 अलौह निर्मित धातु सामग्रियॉ ।
92 ईधन और ईधन के तेल ।
93 लकड़ी।
97 चल स्टाक की सम्पूर्ण इकाइयॉ ।
98 रद्दी सामान ।
भण्डारण व्यवस्था की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका विभिन्न स्थलों पर स्थापित डिपो निभातें हैं ।
प्रत्येक डिपो के सर्वोच्च अधिकारी को डिपो अधिकारी के रूप में जाना जाता है । वह भण्डारों के स्टाक का कुशल अनुरक्षण करने, अपने डिपो द्वारा सेवित क्षेत्र की तत्काल सेवा करने , स्टाक में रखे भण्डारों का अभिरक्षण करने, इस तरह के स्टाक का किसी भी समय बहीखातों में दिखाये गये शेषों के सही मिलान करने, सभी मुख्य दस्तावेज, बहीखाता, बिन कार्ड और सहायक पंजिकायें सही ढंग से तैयार करने और उनमें इंदराज करने, सम्बन्धित वाउचरों और दस्तावेजों को निर्धरित तिथियों को लेखा अधिकारी को देने और अधिशेषों तथा रद्दी भण्डारों का निपटारा करने के लिए भण्डार नियन्त्रक के प्रति उत्तरदायी है । मुख्यत: किसी भी डिपो में निम्न अनुभाग होते हैं ।
क- भंडारों की प्राप्ति और निरीक्षण :
यह अनुभाग जिसे डिपो में आने वाले सामनों से संबंधित सभी दस्तावेजों का निष्पादन करना होता है, डिपो के वार्डों और अनुभागों से अलग होता है और किसी पर्यवेक्षक को सामानों की वास्तविक प्राप्ति का निष्पादन करने के लिए इस अनुभाग के अधीन कार्य करता है ।
ख- सामानों का भंडारण और निर्गम :
भंडार डिपो के भंडारों में रखे गए भंडारों और सामानों को विभिन्न वार्डों में वितरित किया जाता है और एक वार्ड को एक या अधिक वर्गों के भंडार रखा जाता है । संदर्भ की सुविधा के लिए वार्डों को वर्णानुक्रम में निर्दिष्ट किया गया है । प्रत्येक वार्ड या वार्डों के समूह एक मुख्य डिपो सामग्री अधीक्षक के अधीन रखा गया है जिसकी सहायता के लिए डिपो सामग्री अधीक्षक-।, डिपो सामग्री अधीक्षक-।।, डिपो सामग्री अधीक्षक-।।। रखे गए हैं ।
ग- सामानों का प्रेषण :
यह अनुभाग भी जिसे डिपो के बाहर जाने वाले भंडारों और सामानों का निष्पादन करना होता है स्वतंत्र इकाई के रूप में अलग है । इस अनुभाग द्वारा सामान वाली ट्रकों रेलगाडि़यों या भंडारयानों का नियंत्रण होता है ।
घ- संख्यागत बही खाते बिन कार्ड का रख-रखाव एवं भंडारों की प्रतिपूर्ति:
सामानों के स्टॉक से संबंधित डिपो का लिपिक वर्गीय कार्य केन्द्रीय बही खाता अनुभाग में निष्पादित होता है, जहॉं डिपो के सभी तरह के डिपो कार्ड अद्यतन रूप में रखे गए हैं । इस अनुभाग को उप अनुभागों में विभाजित किया गया है और प्रत्येक वर्गों के स्टॉक का संख्यागत लेखा रखने और भंडारों की प्रतिपूर्ति करने का कार्य होता है । जिनके संबंध में उससे संलग्न वार्डों में कार्य निष्पादन किया जाता है । एक अलग अनुभाग को, डिपो के मांगकर्ताओं द्वारा दिए गए अधियाचनों की प्राप्ति और पंजीकरण का कार्य करना होता है जिसे अधियाचन पंजीकरण अनुभाग कहा जाता है । प्रत्येक वार्ड द्वारा अपने यहॉं स्टॉक में रखे गए भंडार वर्गों के स्टॉक कार्ड रखे जाते हैं इनमें इन्द्राज करने और स्टॉक की प्रतिपूर्ति करने के सभी अनिवार्य कार्य बहीखाता अनुभाग में किए जाते हैं।
ङ- अधिशेष भंडारों और रद्दी सामानों का निपटारा :
इस अनुभाग को प्राप्ति वर्गीकरण स्टॉक रखने और उन रद्दी सामानों की बिक्री करने का कार्य करना होता है । जो रेल के बाह्यान्तर क्षेत्रों से प्राप्त होते हैं या किसी अन्य प्रकार से इक्ट्ठे होते हैं ।
डिपो में वार्डों का विन्यास :
उपर्युक्त वार्डों को स्थापित करते समय निम्न बातों का ध्यान रखा जाता है ।
01. संरक्षा और सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए उपलब्ध स्थान का अधिकतम उपयोग ।
02. सामग्री की संभलाई कम से कम हो ।
03. निरीक्षण के लिए बेहतर सुरक्षा ।
04. संकुलन से बचे और भंडार डिपो की बेहतर कुशलता प्राप्त करे ।
05. बहुविधि सप्लाई से बचें ।
06. पहले आए पहले जाए । फीफो कार्यविधि का कड़ाई से पालन करने की सुविधा ।
07. उपस्करों और श्रमशक्ति का बेहतर उपयोग ।
08. कार्यलय स्थान, पहुंच मार्ग, तेल, आक्सीजन, पेंट लकड़ी के लिए अलग गोदाम तथा अलौह मदों के लिए सुदृढ़ कक्ष की व्यवस्था ।
09. अग्निशमन हाइड्रेंट के लिए संप का निर्माण और पहुंच सड़क सुविधा़ अग्निशामक आदि ।
10. पर्याप्त उचांई वाली चाहरदीवारी ।
11. यार्ड, मालगोदाम के भीतर और चाहरदीवारी पर प्रकाश व्यवस्था । तथा टावर बत्ती/वॉच टावर की व्यवस्था ।
विभिन्न वार्डों में विभिन्न वर्गों के मदों को भंडारित किए जाने की रूपरेखा उदाहरण स्वरूप आलमबाग डिपो में स्थापित वार्डों एवं उनमें स्टॉक किए जाने वाले मदों के विवरण से जानी जा सकती है ।
वार्ड वार्ड संख्या मद
ए 01 तेल एवं पेट्रोलियम पदार्थ ।
02 रसायन अम्ल, एवं सफाई की मदें ।
03 घर्षण एवं प्रेषण व औजार ।
बी 04 लौह निर्मित वस्तुऍ ।
05 हार्डवेयर रिविट, नट बोल्ट ।
06 स्थाई रेलपथ सामग्री, पाइप, नली ट्यूब के उपस्कर, विद्युत
छड़, बियरिंग, पेंटिंग ब्रस ।
सी 07 संकेत एवं दूरसंचार सामग्री ।
08 विद्युत सामग्री ।
09 टी0आर0टी0 मदें ।
डी 10 सवारी एवं माल डिब्बा से संबंधित मदें ।
11 अन्य सवारी डिब्बा स्टॉक ।
12 पुराने मानक डिज़ाइन के माल डिब्बे की सामग्री ।
13 लौह निर्मित धातु सामग्रियॉं ।
18 इमारती लकड़ी, प्लाई बोर्ड, ऑक्सीजन गैस,एसीटिलीन गैस ।
ई 14 रबड़, चमड़ा कैनवास, प्लास्टिक आदि ।
एफ 15 रंग-रोगन के सामान वार्निश और टिकट बोर्ड ।
जे 16 सिले हुए कपड़े एवं सूत कपास के उत्पाद ।
के 17 बिना सिलाई की यूनीफार्म हेतु कपड़े व सिले हुए कपडे़ ।
रद्दी़ 27 विविध, लौह एवं अलौह रद्दी सामग्रियॉं ।
पी0ओ0एच0 28 रद्दी चल स्टॉक ।
वार्डों में भंडारण व्यवस्था
01. सामानों को स्टॉक में रखना :
सामान के रखने के स्थान और उनके भंडारण की ऐसी विधि है जिससे डिपो में अग्रता के अनुसार उनका निष्पादन किया जाता है और इसके लिए सामानों को भंडार में रखने, हटाने और उनके परिवहन के लिए यांत्रिक सुविधाओं का पूरा लाभ उठाया जाता है जिससे इन कार्यों में लगने वाला शारीरिक श्रम कम होता है ।
02. अलग-अलग सामानों के चट्टे लगाना :
सामान को जमा कर रखने तथा वर्तमान स्टॉक को किसी भी समय एक नजर में देखने की सुविधा के लिए भंडारों को स्टॉक में रखने की ऐसी विधि बनाई गई है जिससे भंडारों को विभिन्न गहराइयों में एक पंक्ति से अनेक पक्तियों की पर्तों में लगा कर रखा जाता है । छोटे सामानों के मामले में, एक निर्गम के लिए एक औसत मात्रा में बोरो में समान मात्रा या तौल या संख्या में सामानों को बंद करके रखने की विधि अपनाई जाती है । इसके अतिरिक्त जहॉं तक संभव होता है, डिब्बों या वेष्ठनों पर क्रमांक अंकित किया जाता है, जिससे सामानों से पहले से कुछ निर्धारित मात्राओं में रखे होने का पता चलता है और जिससे सामानों के प्रभारी व्यस्त डिपो सामग्री अधीक्षक को एक नजर में अपने अभिरंक्षण में रखे सामानों की जानकारी हो जाती है और प्रतिपूर्ति के लिए कार्यवाही करने में सहायता मिलती है ।
03. सामानों को हटाने एवं बढ़ाने की व्यवस्था :
सामानों को चढ़ाना, उतारना, उनका चट्टा लगाना और संचालन किसी जिम्मेदार अधीनस्थ कर्मचारी की देखरेख में किया जाता है ताकि सामान हटाने एवं बढ़ाने की प्रक्रिया के बीच नष्ट न हो और श्रमिक कर्मचारी बेढंगे तरीके से सामानों के हटाने बढ़ाने और भारी सामानों को हटाने बढ़ाने के लिए निर्धारित सावधानियों की अवहेलना करने के कारण दुर्घटनाओं के शिकार नहीं होते हैं । यार्डों और वार्डों के कुछ प्रतिशत कर्मचारियों को दुर्घटना के समय प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है और वार्डों तथा यार्डों में आवश्यक संख्या प्राथमिक चिकित्सा पेटियों की व्यवस्था है । सभी दुर्घटनाओं की सूचना निर्दिष्ट नियमों के अनुसार प्राधिकारियों को दी जाती है ।
04. अधिकाधिक सामग्री प्रदर्शन का सिद्धान्त:
सामग्री का भण्डारण इस प्रकार किया जाता है कि सामग्री की अधिकाधिक मदें साफ प्रदर्शित हो सके जिससे सामग्री की पहचान एवं उस तक पहुंच सरल बन सके ।
05. पर्याप्त लोच का सिद्धान्त
भरण इस प्रकार किया जाता है कि यथासमय उसमें सरलतापूर्वक परिवर्तन भी किये जा सके ।
06. स्टाक सत्यापन सुविधा का सिद्धान्त
संग्रहण एवं भरण में इतना स्थान अवश्य छोड़ा जाता है जिससे सामग्री का भौतिक सत्यापन सरलतापूर्वक किया जा सके ।
07. भण्डार सामग्री एवं हस्थन उपकरणो के न्यूनतम उपयोग का सिद्धान्त
जहां तक सम्भव हो सके, भरण को इतना सरल तथा कुशल बनाया जाना चाहिए कि विभिन्न उपकरणों का प्रयोग न्यनतम करना पड़े । यदि उपकरणों की आवश्यकता बढ़ती है तो पूंजी लागत एवं परिचालन लागत भी बढ़ती है, जो भण्डार रक्षण लागत में अभिवृद्धि का कारण बनती है ।
08. सामग्री तक शीध्र पहुंच का सिद्धान्त
सामग्री इस ढंग से भण्डार में रखी जानी चाहिए, ताकि वहॉ शीध्रता से बिना किसी कठिनाई के पहुंचा जा सके और उसे प्राप्त किया जा सके । यदि रास्ता घिरा हुआ है और सामग्री अस्त व्यस्त पड़ी है तो इससे समय व श्रम की बरबादी ही होती है ।
09. पुराने भण्डार के शीध्र उपयोग का सिद्धान्त
वैसे यह सिद्धान्त प्रत्यक्ष रूप से सामग्री निर्गमन नीति का मार्ग दर्शन करता है, लेकिन सामग्री का संग्रहण इस प्रकार से करना चाहिए कि पुराना स्टाक पहले निर्गमित होता रहे । नये स्टाक का भरण पूराने स्टाक के पीछे करना ठीक रहता है, ताकि स्वत: पुराने स्टाक की निकासी पहले हो सके ।
10. सामग्री सूची की शीध्र पहचान का सिद्धान्त
सामग्री की विभिन्न मदें इस प्रकार से रखी जानी चाहिए तथा उन पर ऐसे चिन्ह अंकित किये जाने चाहिए ताकि सरलता से पहचाना जा सके । भरण कार्य िवशिष्टता एवं विभिन्न स्थानों के आधार पर करना अधिक सुविधा जनक रहता है ।
11. न्यूनतम पुनर्हस्थन का सिद्धान्त
श्रम एवं समय की बचत के लिए पुनर्हस्थन से समय बचाना चाहिए । जहां तक सम्भव हो, प्राप्त सामग्री को बिना उतारे चढ़ाये उत्पादन केन्द्रो तक भेजा जाना चाहिए । साथ ही हल्की तथा बार बार निर्गमित की जाने वाली सामग्री का भरण दरवाजे अथवा खिड़कियों के पास करना चाहिए ताकि बिना अधिक हस्थन के अबिलम्ब निर्गमन सम्भव हो सके ।
12. शीध्र निरीक्षण का सिद्धान्त
संग्रहण इस प्रकार से करना चाहिए ताकि सामग्री की मात्रा एवं उसकी दशा का शीध्र निरीक्षण किया जा सके । यह सिद्धान्त सामग्री को निश्चित इकाई बोझों में जमा किया जा सकता है । इसमें गणना कार्य शीध्र एवं सरल हो जाता है ।
13. आधुनिक उपकरणें के प्रयोग का सिद्धान्त
सामग्री पर्याप्त सुरक्षा एवं उपलब्ध स्थान के अधिकतम उपयोग के लिए विभिन्न आधुनिक उपकरणों का प्रयोग अपेक्षित है जैसे अलमीरा ड्रम, थैले, टीन एवं कुण्डे आदि का उपयोग करना ठीक रहता है, वैसे इन उपकरणों का उपयोग सामग्री की प्रकृति, आकार, भार आदि पर निर्भर करता है ।
भंडारों का अभिरक्षण एवं सुरक्षा :
डिपो के डिपो सामग्री अधीक्षक और उसके कर्मचारियों का यह कर्तव्य होता है कि वे भंडारों एवं सामानों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए उपयुक्त सावधानी बरततें हैं । बहुमूल्य भंडार और उपस्कर और घर गृहस्थी के काम में आने वाले सामान्य सामान जिनकी लुके छिपे चोरी होने की विशेष सम्भावना होती है, ताला बंद शेड या आच्छादनों में रखा जाता है तथा ज्वलनशील सामानों जैसे पालिस्टर और सूची वस्त्रों, रबड़ एवं प्लास्टिक के सामानों, अलकतरा,लकड़ी, सुतली और पेट्रोल के उत्पादनों इत्यादि पर विशेष सावधानी रखी जाती है ।
अग्निशमन व्यवस्था :
रेलवे सुरक्षा बल के कर्मचारियों की व्यवस्था है और उन्हें और वार्ड के कर्मचारियों को जहॉं तक सम्भव होता है अग्मिशमन अभ्यास कराया जाता है तथा उन्हें अग्निशमन उपकरणों का एवं आग लगने पर किए जाने उपायों का ठीक से परिज्ञान कराया गया है । इस संबंध में उनकी कार्यकुशलता की समय-समय पर अग्निशमन की चेतावनी देकर और दिखावटी अवरोध करा कर परीक्षा ली जाती है । डिपो में पर्याप्त आसानी से हाथ लगने वाले अग्निरक्षक और उपस्कर, जैसे रासायनिक अग्निशामक, पानी और बाली भरी बाल्टियॉं, पानी के नल, हौज पाइपें और हटाए बढ़ाए जाने वाले पानी के पंपो की व्यवस्था है । लकड़ी के सामानों, अलकतरा, सुतली, तेल, पेट्रोल के उत्पादनों, पालिस्टर और सूती धागों, रबड़ और प्लास्टिक के उत्पादनों इत्यादि के रखने के स्थानों पर तत्काल आग पकड़ने वाले ऐसे सामानों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है ।
संरक्षण:
संरक्षण के मुख्य रुप से तीन उद्देश्य है जोकि इस तरह हैं।
1. सामग्री की सभी तरह से होने वाली क्षति, नष्ट होने या हानियों से बचाव करना।
2. सामग्रियों को इस तरह सम्भाल कर रखना कि उनकी वास्तविक किस्म व मूल्य बना रहे।
3. इस बात का विश्वास दिलाना कि सामग्री को आसानी से ढूढ़ा जा सकता है तथा उसे विभिन्न विभागों अथवा कार्य आदेशों को उपयोगी दशा में जारी किया जायेगा।
भंडारण में ह्रास:
सामानों तथा उपकरणों से कुछ कार्य करने की अपेक्षा की जाती है तथा उन्हें ऐसा करने के लिए गुणवत्ता मानक बनाए गए है। स्टोरकीपर यह सुनिश्चित करे कि जब तक सामान उसकी अभिरक्षा में है, उनको नुकसान होने से बचाए रखे तथा वे उनका विश्िष्ट उद्श्यों को पूरा कने के लिए तात्विक मूल्य तथा गुणवत्ता बनाए रखें। हालांकि यह बहुत कठिन कार्य है विशेषकर भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में जहां तापमान, वर्षा तथा आर्द्रता में मौसमी परिवर्तन है तथा सामान के खराब होने की संभावना रहती है। उद्योग विभिन्न प्रकार के सामानों जैसे हार्डवेयर, पेंट, सीमेंट, चमड़े का सामान, रबड़ की वस्तुएं मशीनरी, इलेक्ट्रानिक उपकरणों आदि का भारी मात्रा में प्रयोग करते है। वे उन पदार्थो से बने होते हैं, जिनमें से कुछ अपनी प्रकृति के अनुरुप खराब होते रहते है।
ह्रास क्या है
ह्रास का प्रयोग विशिष्ट प्रयोजन के लिए सामान की कीमत में कमी को दर्शाने के लिए किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसका अर्थ सामान की उस कार्यप्रणाली को पूरा करने की क्षमता में कमी है जिसके लिए इसकी मॉग की गई थी।
ह्रास के लिए जिम्मेवार तत्व
किसी भी प्रकार के सामान के ह्रास के लिए जिम्मेवार तीन मूलभूत तत्वों को माना जाता है:-
1. सामान की अन्तर्निहित विशेषता
2. कारकों एजेंसियों की मूल विशेषता, जिसके अनुसार यह प्राकृतिक रुप से सामान की स्थिति को बदलने की प्रवृत्ति रखती है।
3. उपर्युक्त 1 तथा 2 तत्वों के पारस्परिक प्रभाव लाने वाला वातावरण।
ह्रास के कारक
ह्रास लाने वाले कारकों एजेसियों को निम्न रुप में वर्गीकृत किया जा सकता है:-
1. जलवायु तथा वातावरण
2. भौतिकीय तथा रासायनिक कारक
3. जैविकीय कारक
अकेले या अपने संपर्क में आए पदार्थ से मिलाकर क्रिया करते हैं।
1. जलवायु तथा वातावरण:
जलवायु के मुख्य तत्व हैं:-
क). तापमान
ख). बारिश- वृष्िठपात
ग). आर्द्रता
घ). हवा वायुदाब- कुछ हद तक
प्रत्येक पदार्थ उपर्युक्त तत्वों के विशेष समूह के अधीन अपने अपेक्षित गुणों को बनाये रखने की सर्वोत्तम क्षमता को दर्शाते है।
2. भौतिक तथा रासायनिक कारक:
सूर्य की रोशनी, ऊष्मा,हवा,धूल आदि को भौतिकीय कारक के रुप में वर्गीकृत किया जाता है तथा नमी, नमक, एसिड,एल्कली, गैस को रासायनिक कारक के रुप में वर्गीकृत किया जाता है।
क). सूर्य की रोशनी अल्ट्रावायलेट किरणें या तो अकेले या अन्य कारकों जैसे नमी या आक्सीजन के साथ मिलकर पदार्थो में रासायनिक क्रिया करती हैं। यह टेक्सटाइल, प्लास्िटक आदि को प्रभावित करती है।
ख). ऊष्मा से ज्यादातर मामलों में आग लगती है। इसकी प्रवृत्ति पदार्थों को भुरभुरा बनाने की होती है। इससे आक्सीकरण भी हो सकता है।
ग). हवा में कार्बन डाइआक्साइड, सल्र आक्साइड, हाइड्रोजन सल्र आदि जैसे तत्व होते है जिससे चमड़े की वस्तुओं, टेक्सटाइल तथा अन्य कई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
घ). धूल, मिट्टी तथा बालू आर्द्रताग्राही हैं तथा आर्द्र वातावरण से नमी को सोख लेती है। इससे पदार्थ भौतिकीय तथा रासायनिक दोनों रुप में प्रभावित होते है क्योंकि कुछ कण कार्बनिक तथा कुछ अकार्बनिक है।
ड़). नमक लौह धातुओं के क्षय को बढ़ाता है।
3.- जैविकीय कारक:
वे सक्रिय जीव हैं तथा अनुकूल वातावरण में भोजन जैसे कार्बनिक पदार्थो में बढ़ते हैं। इन्हें निम्न रुप में वर्गीकृत किया जा सकता है:
क ). सूक्ष्म जीव इन्हें और आगे उप विभाजित किया जा सकता है:-
1. सब्जियों में उत्पन्न
2. बैक्टेरिया पशुओं में उत्पन्न
वे सभी भोजन, आक्सीजन, नमी तथा आर्द्रता में पनपते हैं।
की जाने वाली कार्रवाई इस प्रकार है:-
हवाबंद पैकेजों का उपयोग करें।
पर्याप्त वायुसंचार उपलब्ध कराएं।
उचित निभार में सामान रखें।
खुले में रखे स्टाक को तिरपाल से ढ़कें।
स्टाक को बार-बार हिलाते रहना चाहिए विशेषकर टेक्सटाइल।
रखे सामान में से नमी हटाने के लिए धूप में रखना चाहिए- उदाहरण के लिए टेक्सटाइल, चमड़े आदि जैसे पड़े सामान।
ख). कीट- इन्हें और आगे उपविभाजित किया जा सकता है:-
1. वे जो लकड़ी पर हमला करते हैं जैसे दीमक, बांसबेधक आदि।
2. अन्य जैसे वूली वीयर, पंतगा आदि।
दो तरीके से कार्रवाई की जाती है:-
निवारक
संक्रमित सामान को अलग करना।
आवधिक निरीक्षण , वायुसंचार, रँगाई।
कीटरोधी पैकिंग।
दीमकरोधी निभार का प्रयोग।
रोगनाशक
डीडीटी, गामाक्सीन आदि संपर्क द्वारा जहर के रुप में।
कुछ मिश्रण पेट के जहर के रुप में।
सीटीसी धुंए के रुप में।
नै चथेलीन विकर्षक के रुप में
ग). कृन्तक दो तरीके से कार्रवाई की जा सकती है:-
निवारक
कंक्रीट या ईट के चर्श का उपयोग।
दरवाजे तथा खिड़कियों के किनारों पर टिन प्लेट लगाएं। साथ ही, मालगोदाम के दरवाजे तथा खिड़कियां अच्छी तरह से लगे होने चाहिए।
खिड़कियों की सिल चर्श से कम से कम 1 मी0 ऊपर होनी चाहिए।
ड्रेन पाइप को कंटीले तार से ढ़कना चाहिए।
रोगनाशक
जाल का उपयोग करें तथा कृन्तक को नष्ट करें।
जहरीले चारे का उपयोग करें तथा कृन्तक को नष्ट करें, चूहे के बिलों में धुंआ छोड़े।
दीमक:
जैवकीय कारकों में सबसे खतरनाक दीमक है। वे बिल्िडगों तथा सामानों को सबसे अधिक क्षति पहुंचाते हैं।
दीमक सुसंगठित होते हैं, उनका एक अच्छा सामाजिक संगठन है। मनुष्यों की तरह उनकी भी कई जातियां हैं- रायल जाति, वर्कर तथा सोल्जर। वर्कर्स की संख्या सबसे अधिक तथा रयल जाति सबसे कम होती हैं।
दीमक सेलूलोज पर निर्भर हैं, जो पौधों का एक महत्वपूर्ण घटक होता है। टिम्बर, टेक्सटाइल, कागज, चमड़ा, अनाज आदि पदार्थो में अत्यधिक सेलूलोज होता है तथा इसलिए उन पर आक्रमण होता है तथा उन्हें क्षति पहुंचती है। वर्कर पत्थर, सीमेंट, कंक्रीट तथा धातुओं को छोड़कर अन्य पदार्थों में छेद करते हैं। वे पदार्थों को खाते हैं तथा पदार्थ का कुछ अंश अपनी कालोनी के अन्य सदस्यों को भी खिलाते हैं।
दीमक को वर्गीकृत किया जा सकता है:
1. लकड़ी में रहने वाले
2 जमीन में रहने वाले
लकड़ी में रहने वाले दीमक द्वारा पहुंचाई गई क्षति के कोई बाहरी लक्षण नजर नहीं आते जब तक कि टिम्ब्र इतना कमजोर न हो जाए कि वह गिर जाए। जमीन में रहने वाले दीमक द्वारा की गई क्षति को वर्करों द्वारा बनाई गई मिट्टी की सुरंग से पता लगाया जा सकता है जो पदार्थ को जमीन के साथ जोड़ते या जमीन के नीचे अपना घर बनाते है। वर्कर तथा सोल्जर बहुत नाजुक होते हैं अगर कुछ समय के लिए उन्हें वातावरण में खुला छोड़ा जाए तो वे अपने शरीर का पानी छोड़ते हैं तथा मर जाते हैं। अंत: वे गीले कीचड़ वाली सुरंग में चलते हैं। वर्कर तथा सोल्जर प्राय: लगभग छ: महीने तक तथा रायल छ: से नौ वर्षो तक जीवित रहते हैं।
ऐहतियाती उपाय:
1. पदार्थो पर क्रियोसोट, डीडीटी, गामाक्सीन, कॉपर नचेथीनेट, एल्ड्रिन, क्लोरोडीन आदि जैसे कीटनाशन छिड़कें।
2. यदि टेक्सटाइल, कागज, खाद्य पदार्थ आदि जैसे कुछ पदार्थों पर कीटनाशक छिड़कना संभव न हो तो जमीन के नीचे दीमक के घरों तथा पदार्थों के बीच बैरियर लगाए जाएं। इसके लिए भवन बनाने या जमीन पर ढ़ेर लगाने से पहले जमीन पर कीटनाशक छिड़क दें। इस प्रयोजन के लिए 10 से 15 सेंटीमीटर तक जमीन खोदें तथा निम्नलिखित में से किसी का छिड़काव करें।
क.- 5 लीटर प्रति वर्ग मीटर की दर पर एल्ड्रिन का 05 प्रतिशत मिश्रण।
ख.- 7 लीटर प्रति वर्ग मीटर की दर पर पानी में एक प्रतिशत क्लोरोडीन का घोल।
ग.- केरोसोट तथा उपयोग किए गए इंजन आयल के 1:1 मिश्रण का मिट्टी में स्प्रे।
3. दीमकरोधी निभार:
जहॉ मालगोदाम जमीन पर छिड़काव किए बिना दीमकरोधी नहीं है या जहां सामान बिना कीटनाशक छिड़कान के रखा गया है, वहां सामान का दीमकरोधी निभार में ढे़र लगाना चाहिए।
क.- जमीन तथा ढ़ेर के निचले हिस्से के बीच न्यूनतक 30 सैमी जगह छोड़ी जाए।
ख.- दीवारों तथा ढ़ेरों के बगल के बीच 15 सेमी क्षैतिज जगह छोड़ी जाए।
ग.- प्रत्येक निभार स्तम्भ के ऊपर धातु शील्ड डाली जाए। शील्ड स्तम्भ के सिरे से 8 सेमी पर होनी चाहिए तथा शील्ड एवं ढ़ेर की निचली सतह के बीच 8 सेमी का अंतर होना चाहिए।
घ.- यदि सनिभार स्वयं संदिग्ध पदार्थों से बना हो तो इस पर क्रियोसोट या अन्य कीटनाशकों का छिड़काव करें ताकि दीमक इस निभार को न खा सके।
ङ.- दीमक से बचाने के लिए समय-समय पर ढेरों के नीचे की जगह तथा पूरे शील्ड का निरीक्षण करें।
सबसे अच्छा उपाय यह है कि किसी अच्छे कीट नियंत्रक चर्म के विशेषज्ञ से सलाह लें तथा पूरे स्थान पर छिड़काव कराएं।
ह्रास की रोकथाम
मालगोदाम में यदि अधिक समय तक सामान रखा जाए तो वह सामान क्षतिग्रस्त हो जाता है।
अच्छे परिणाम के लिए कुछ बुनियादी सावधानियां बरती जा सकती हैं:-
1. उपयोग अवधि : टार्च सैल, पेंट तथा इसी प्रकार की मदें जिनकी उपयोग अवधि कम होती है, की पहचान करें तथा उन्हें अलग रखें। एक समय में केवल अपेक्षित मात्रा में ही इनकी खरीद की जाए तथा जारी की जाए ताकि इनके प्रयोग की अवधि समाप्त होने से पहले इसका उपयोग किया जा सके।
मांगकर्ताओं को ऐसे सामान की पहले जानकारी दी जाए कि इनकी अवधि समाप्त होने वाली है तथा उनको यह सामान लेने तथा उनकी अवधि की समाप्ति से पहले उनका उपयोग करने में उनकी सहायता लेनी चाहिए।
2. जारी करने का क्रम: भंडारण में सामान नष्ट न हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए उनकी प्राप्ति की तारीखों के अनुसार अलग रखना चाहिए- प्रत्येक प्राप्ति को ढ़ेर या बैचों द्वारा पहचाना जाए ताकि उनके निर्माण की तारीख या आपूर्ति की तारीख के अनुसार उनका अनुमान लगाया जा सके। इससे पहले प्रवेश पहले निकास- फीको सिध्दाँत के आधार पर जारी करना संभव होगा। आमतौर पर इस सिध्दाँत को अपनाया जाता है। तथापि, कुछ अपवाद भी होते हैं जब समान की आयु कम होती है, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है। यह तभी हो सकता है कि पहले प्राप्त सामान की आयु बाद में आए सामान से लम्बी हो। ऐसी स्थिति में प्राय: फीको सिध्दाँत के स्थान पर फीको अंतिम प्रवेश पहले निकास को अपनाया जाता है।
3. स्प्लायर्स पैकेज: अच्छा तो यह है कि निर्माता के मूल डिब्बे मात्रा तथा गुणवत्ता जांच तक के लिए कुछ सामान को न छेड़ा जाए क्योंकि इससे निर्माता द्वारा लगाए गए रक्षात्मक आवरण नष्ट हो जाएंगे। उदाहरण के लिए रोलर बियरिंग को ग्रीस लगाकर संसेचित पेपर से लपेटा जाता है तथा कार्डबोर्ड बक्सों में सील किया जाता है। सुरक्षित रखने के लिए ऐसे पैकेजों को विस्तार से सामान की जांच के लिए नहीं खोलना चाहिए। इसे बंद रखें जब तक कि वास्तविक रुप से इसके उपयोग की जरुरत न हो।
4. वातानुकूलित भंडारण: कुछ कीमती, नाजुक तथा सूक्ष्म धातु पुर्जे, स्पेयर्स तथा वैज्ञानिक उपकरण भी तापमान तथा आर्द्रता नियंत्रित वातानुकूल भंडार में रखे जाते हैं।
5. जहां तक संभव हो गर्म तथा गीली जगहों पर भंडारण से बचा जाए- विशेषकर ऊनी कपडे़ जैसी मदों के लिए।
भंडार की कुछ महत्वपूर्ण मदों का संरक्षण:
1. अपघर्षक- कपड़े, कागज, पहिए नमी से ह्रास होता है। अपघर्षक कण ढ़ीले पड़ जाते हैं तथा वे गिर जाते हैं। नम या गीले अपघकर्षक कागज को अच्छी तरह सुखाना चाहिए । अत्यधिक सुखाने या उच्च तापमान से बचाना चाहिए क्योकि इससे कपड़े तथा कागज का निम्नकोटिकरण होता है ।
अपघर्षक कपड़ो तथा कागज को जलरोधी कागजों या जलरोधि कंटेनरों में लपेटकर रखना चाहिए । अपघर्षक पहियों को सेल्फ में रखना चाहिए ।
2. तेजाब:
तेजाब को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:
क. इन्हें अच्छे वायुसंचार तथा ठण्डे सथान पर रखे । लकड़ी के भवन से बचे ।
ख .लगभग पाँच सेन्टीमीटर की परत वाले कंकरीट फर्श पर रखें ।
ग .सीधे धूप से बचें ।
घ. भण्डारण के लिए शेल्फों के प्रयोग से बचे ।
ड. कंटेनरों के ढक्कन हवा बन्द होने चाहिए । हवा बन्द बनाने के लिए उनको पिघली मोम से शील करें ।
च. इनको लाते ले जाते समय ओवरआल, रबड़, ग्लोव्स तथा गमबूट जैसे ऐहतियाती कपड़ों का उपयोग करें ।
छ .दुर्घटना से बचने के लिए सोडा का दस प्रतिशत बायोकार्बोनेट का न्यूट्रालाइजिंग सोल्यूशन हमेशा तैयार रखना चाहिए ।
3. एब्सेस्टस उत्पाद:
निम्नलिखित तथ्यों को ध्यान में रखें:
क. अपनी प्रकृति के अनुसार उनका ज्यादा ह्रास नहीं होता । अनुचित भण्डारण के कारण उनमें क्रैक और हेयर स्पीलीटिंग हो सकता है ।
ख. भण्डार भुरभुरें हैं तथा उनको विशेष रूप से संभाल कर रखना चाहिए ।
ग. इनको धूप से बचाना चाहिए । प्राय: ये खुले स्थान पर रखे जाते हैं तो इन पर सूर्य की रोशनी शीधी पड़ती है । चूंकि सीधी सूर्य की किरणों से बचाना है, एक ऊपरी कवर आवश्यक है । इनकी ही कुछ चादरों को क्षत के रूप में उपयोग किया जा सकता है ।
घ. चद्दरों का ढेर 75 से 100 चद्दरों से बड़ा नहीं होना चाहिए । प्रत्येक ढेर समान आकार की चद्दरों का होना चाहिए तथा चद्दरों के समतल हिस्से को ऊपर रख कर ढेर लगाना चाहिए । ढेर इस प्रकार लगाना चाहिए कि चद्दरों के बीच वारिश का पानी आने से बचा जा सके ।
4 बैटरी
क. भंडारण लीड एसिड बनाने वालों द्वारा दिये गये चार्जिग तिथि को नोट करें ।
ख. यदि इस तारीख से पहले जारी नहीं किया जाता तो बैटरी को पिर चार्ज करें ।मिनरल जेली से टरमिनलों को ढकें ।
ग .ढंड के महीनों अगस्त से मार्च के दौरान प्रत्येक महीने तथा गरम मौसम अप्रैल से जुलाई के दौरान प्रत्येक 15 दिनों में नाममात्र का चार्ज दिया जा सकता है ।
घ. प्रत्येक तिमाही बैटरी को पूरी तरह से डिस्चार्ज करें तथा पुन: चार्ज करें ।
ड .इलैक्ट्रोलाअट स्तर को प्लेट से आधा इंच ऊपर रखने के लिए डिस्िटल पानी बैटरी में डालें ।
5. टार्च सैल:
क.- सैलों के पैकिंग केसों को इस प्रकार रखना चाहिए कि उसमें हवा का पर्याप्त परिचालन हो- विशेषकर यदि आर्द्रता अधिक हो।
ख.- लगभग 70 एफ तथा 50 से 60 प्रतिशत की आर्द्रता के साथ वातानुकूलित स्थान सर्वोत्तम है।
ग.- यदि वातानुकूलित स्थान उपलब्ध नहीं है तो सैलों को ठंडे स्थान पर रखना चाहिए ।
घ.- उक्त सावधानियों से इनकी सेल्फ लाइफ बढ़ाई जा सकती है।
ड़.- सभी सैलों की समय-समय पर जांच करनी चाहिए।
6. ब्रश:
तीन प्रकार के ब्रशों को रखा जाता है- जानवरों के बालों सूअर के बाल, ऊँट तथा घोड़े के बाल से बने ब्रश, पौधों के रेशों से बने ब्रश तथा सिथेंटिक पदार्थो से बने ब्रश।
जानवरों के बालों वाले ब्रशों पर पंतंगों कपड़े वाले कीड़े द्वारा हमला नहीं किया जा सकता लेकिन वुली कीड़ों द्वारा हमले की आंशका है। ब्रशों को 5 प्रतिशत डीडीटी पाउडर तथा 95 प्रतिशत फ्रेंच चॉक के घोल के साथ धोएं। जिन ब्रशों पर डीडीटी का स्प्रे नहीं किया गया है उनको स्थान के 1 ओंज प्रति क्यूबिक फुट की दर पर नेपथेलीन के साथ हवा बंद पैकिंग में रखा जाए।
पौधे के रेशे वाले ब्रशों को जीवाणु से बचाना होगा। यह आक्सीजन या हवा सप्लाई, तापमान, नमी आदि को नियंत्रित कर किया जा सकता है।
सिथेंटिक पदार्थो से बने ब्रशों को रोशनी, ताप तथा पानी , एसिड, एल्कली तथा कार्बनिक घोलों के संपर्क से बचाना होगा।
7. कैल्शियम कार्बाइड:
इसके पानी या नमी के संपर्क से एसीटिलीन बनती है जो अति ज्वलनशील गैस है। 28 एलबीएस से अधिक के भंडारण के लिए लाइसेंस की जरुरत है। वायुरुध्द सील युक्त धातु के ड्रम वाले कंटेनर होने चाहिए जिसमें चेतावनी लिखी हो। कैल्शियम कार्बाइड- खतरनाक- यदि सूखा न रखा गया।
यदि मात्रा 28 एलबीएस से कम है तो इसे शुष्क, अच्छे वायुसंचार वाले कमरे में रखना चाहिए, जहां केवल प्राधिकृत व्यक्तियों को प्रवेश की अनुमति दी जाए।
यदि मात्रा 28 एलबीएस से अधिक है तो इसे निर्जन भवन में रखना चाहिए जिसकी अन्य परिसरों से दूरी होगी:
28 एलबीएस से 500 एलबीएस - 20 फीट
500 एलबीएस से 3000 एलबीएस - 40 फीट
3000 एलबीएस तथा अधिक - 100 फीट
किसी एक भवन में 50 टन से अधिक सामान नहीं रखा जाए।
भवन का निर्माण भूमितल से 1 फुट ऊपर ज्वलनशील पदार्थो से बना होना चाहिए। रैक फर्श स्तर से एक फुट ऊपर होना चाहिए। स्टाक के नजदीक सीधी लौ नहीं आनी चाहिए।
यदि कोई कार्बाइड गीला हो जाता है तो इसे गहरे पानी में डुबोकर नष्ट कर देना चाहिए या निर्जन क्षेत्र में खुले में फैला देना चाहिए।
8. सीमेंट:
इसकी गुणवत्ता लम्बे समय तक रहती है यदि इसे नमी से दूर रखा जाए। एक से दो प्रतिशत पानी के समावेश से इसकी गुणवत्ता पर कोई पर्याप्त प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन पाँच प्रतिशत या अधिक से यह खराब हो जाता है।
क.- सीमेंट की बोरियों को बिना लीक वाली छतों वाले मौसमरोधी सूखे गोदामों में जमीन से काफी ऊपर रखना चाहिए। बोरियों को दीवार से दूर उपयुक्त निभार पर रखना चाहिए ताकि जमीन तथा दीवारों की नमी से बचाया जा सके।
ख.- बोरियों को एक दूसरे के बीच बिना जगह छोड़े रखना चाहिए। ढ़ेर की चौड़ाई 3 मीटर से अधिक तथा ऊचाई 15 बोरियों से अधिक नहीं होनी चाहिए। यदि 7 से 8 बोरियों से अधिक ऊचाई है तो ढ़ेर को पलटने से बचाने के लिए हैडर- स्ट्रैचर लम्बाईवार तथा चौड़ाईवार संरचना बनानी चाहिए।
ग.- मानसून के दौरान तिरपाल से ढ़ंककर रखें यहां तक कि गोदाम के अंदर भी।
घ.- अंतराल पर बोरों को हिलाएं नहीं। यदि नीचे रखा बोरा कठोर लग रहा हो तो इस स्थिति को वेयरहाउस पैक कहते हैं तथा इसे फर्श पर लुढ़का कर यह ठीक हो जाता है।
9. इलैक्ट्रोड:
यह महत्वपूर्ण है कि इलोक्ट्रोड के चारों और फ्लक्स कोटिंग नहीं उखड़ता है। फ्लक्स आर्द्रता से प्रभावित होता है। आर्द्रता फ्लक्स की संरचना में बदलाव लाता है।
क). इलैक्ट्रोड को शैल्फ में रखें तथा गोदाम में सीधे फर्श पर न रखें जहां बरसात के मौसम में यह ताप से गर्म हो सकता है, विशेष रुप से आर्द्र वातावरण से बचाएं।
ख). आमतौर पर सीलबंद धातु के कंटेनरों में सप्लाई प्राप्त होती है। कंटेनर को न छेडे़ तथा जब तक उसकी जरुरत न हो उसे खोलें नहीं।
ग). फ्लक्स को वास्तविक क्षति से बचाने के लिए शॉक से अवश्य बचाना चाहिए।
10. ईधन तेल तथा लुब्रिकेंट:
क.- क्षति से बचाने के लिए ड्रमों को चढ़ाते तथा उतारते समय सावधानी रखनी चाहिए।
ख.- भरे हुए कंटेनरों के अंदर जंग नहीं लगेगा जब तक कि उसमें पानी न जाए। उनकी बाहर से जांच करनी चाहिए तथा यदि जंग लगी होतो दोबारा पेंट करें।
ग.- क्षति से बचने के लिए डॉट या कैप को ध्यान से खोलना चाहिए।
घ.- पीपे को समतल जमीन पर पिरामिड के रुप में लगाना चाहिए। पीपों को एक पंक्ति में दो ऊचे ढ़ेर में या दोहरी पंक्ति में एक के पीछे एक करके रखना चाहिए। डॉट/नग घड़ी की 2 बजे या 10 बजे की स्थिति में होने चाहिए।
ड़.- लीक या जंग का पता लगाने के लिए समय-समय पर निरीक्षण करना चाहिए।
11. गैस- आक्सीजन तथा धुला एसीटिलीन:
इन गैसों के सिलेंडर रेगुलेटर तथा वाल्व के साथ धातु के होते हैं।
क.- गैस सिलेंडरों को ठंडे स्थान पर रखना चाहिए।
ख.- आक्सीजन सिलेंडरों को लेटाकर एवं एसीटिलीन सिलेंडरों को खड़े रुप में रखना चाहिए।
ग.- आक्सीजन तथा एसीटिलीन को अलग तथा एक दूसरे से काफी दूर रखना चाहिए।
घ.- भंडारण क्षेत्र में सीधी रोशनी तथा धूम्रपान की अनुमति नहीं होना चाहिए।
ड़.- सिलेंडर वाल्व खोलते समय हथौड़े का प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्पार्क से आग लग सकती है।
च.- यदि कोई सिलेंडर लीक कर रहा होतो उसे तुरंत खुली हवा में ले जाना चाहिए। ग्लैंड नट यदि ढ़ीला हो तो उसे कसना चाहिए।
12. कांच का सामान:
क.- भंडारण के दौरान कांच की वस्तुओं में खराबी आ जाती है जिसे धुंधलापन कहते हैं। सतह पर मुक्त अल्काली की उपस्थिति, नमी तथा कार्बन डाईआक्साइड की उपस्थिति में घुलनशील कार्बोनेट बनते हैं जो कांच की सतह पर जमा हो जाते हैं जिससे वह धुधला हो जाता है। ग्लास शीट से दृश्य प्रभावित होती है। इसे रोकने के लिए इसे शुष्क वातावरण में रखना चाहिए तथा ग्लास शीटों को सूखे पैकिंग पदार्थो से पैक करना चाहिए।
ख.- खराब संभाल तथा अनुचित पैंकिंग से टूट-फूट होती है। इसे रोकने के लिए :-
1. परापिन मोम से संसेचित कागज से ग्लास की प्रत्येक शीट को दोनों तरफ से ढ़कें।
2. एक पैकेट में छ: अंतपत्र शीटों से ज्यादा न रखें जिसे 2 1/2 सैमी मोटे शुष्क पुआल, घासफूस, लकड़ी की छिलन या दोहरे नालीदार बोर्ड से ढ़कना चाहिए। चार ऐसे पैकेटों को पिर समान पैंकिंग पदार्थ या बुरादा के 5 सैमी के कवर से पैकिंग केस में पैक करना चाहिए। केस का भार सभी सामानों के साथ 35 कि0ग्रा0 से अधिक नहीं होना चाहिए। केसों को सपाट की बजाय खड़ी स्थिति में रखना चाहिए।
13. चमड़े का सामान:
चमड़ा एक प्राकृतिक उत्पाद है जिसे अपरिष्कृत खाल तथा त्वचा को पकाकर, सीझकर आदि प्रक्रिया से प्राप्त किया जाता है ताकि प्राप्त उत्पाद सड़े नहीं तथा वह ताप तथा पानी की क्रिया का प्रतिरोधी भी बन सके। आमतौर पर चर्मशोधन की दो प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। टैनिन आधारित सब्जी उत्पाद प्राप्त किए जाते हैं। इससे स्थिर गुणवत्ता वाले चमड़े का सामान प्राप्त होता है लेकिन यह एक धीमी प्रक्रिया है। क्रोम चर्मशोधन में क्रोम नमक का प्रयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में केवल कुछ घंटे लगते हैं।
ह्रास :- यह निम्न कारणों से होता है:-
क.- प्रतिकूल भंडारण परिस्थितियां: सूर्य की गर्मी या उच्च तापमान से चमड़ा बहुत शुष्क, सख्त हो जाता है तथा मोड़ने पर क्रैक हो जाता है।
ख.- फफूंद लगना: यह आद्र मौसम में होता है या यदि चमड़ा गीला हो जाए। नमी के कारण फफूंद लगने की संभावना रहती है।
ग.- दीमक लगना: केवल यही एक कीट है जिससे काफी क्षति होती है।
घ.- चूहे: चिकनाई वाले पदार्थो से युक्त चमड़ों के समान पर यह हमले करते है।
बचाव:
क.- चमड़े के सामान को उच्च तापमान या धूप में नहीं रखें। ठंडे , शुष्क तथा अच्छे वायु संचार वाले गोदाम में रखें। खाल जैसी मदों के लिए वायुसंचारित अंतर के साथ छोटे ढ़ेर लगाएं।
ख.- जो सामान गीला हो गया हो उसे सूखे कपड़े से पोछें तथा सुखाने के लिए शेड में हवा लगवाएं।
ग.- फफूंद लगे सामान को नम गीला नहीं कपड़े से पोछें तथा मिथिलेटेड स्प्रिट में 1 प्रतिशत पैरा लाइट्रो फेनौल छिड़कें।
घ.- जिन सामानों को सख्त या कठोर या उसी आकार का बनाए रखना है वहां लांड्री सोप मान्य प्रतिरक्षक है।
प्रतिरक्षक लगाने से पहले सामान को सूखे ब्रश से साफ करें। साफ करने के बाद केवल पुराने टुकड़े, स्पंज या हाथ से प्रतिरक्षक खुरदरे साइड में लगाएं। प्रतिरक्षक लगे इस सामान को दो या तीन दिनों तक रखा रहने दें तथा उसके बाद सूखे कपड़े से पोछकर साफ करें। शैडों में खुली हवा में रखें। निर्मित सामान को तब जलरोधी कागज में लपेटा जाए तथा डिब्बे या लकड़ी के केसों में पैक करें ताकि उसके स्वरुप को बिगड़ने, सूखने या फफूंद लगने से बचाया जा सके।
ड़.- विशिष्ट चमड़े के सामान का भंडार:
1. बेल्ट- खुरदरी सतह पर थोड़ी सी चमड़े में लगाने वाली चिकनाई लगाएं।
2. बूट, जूते, चप्पल- इनके ऊपरी तरफ चिकनाई लगाएं। सोल पर लगाने की आवश्यकता नहीं।
3. यंत्र केस, औजार बैक- इनके सतह पर लांड्री सोप लगाएं।
4. चिकनाई/मोम/मिनरल जेली/तेल लगे वाशर, कप, रिंग या पैकिंग को संसेषित करने की आवश्यकता नहीं है।
5. सांभर चर्म से बना सामान- आमतौर पर इनको प्रतिरक्षा की आवश्यकता नहीं, इन्हें केवल सूखा रखें। आर्द्रता भरे मौसम में फ्रेंच चाक से झाड़े।
14. मशीनरी तथा उपस्कर: लम्बी अवधि तक रखे जाने वाली मशीनों या कीमती उपस्करों को धूल तथा नमी से बचाने के लिए कोकून उपयुक्त प्लास्टिक पदार्थों के हवाबंद कबर से पूरी तरह ढकने की आवश्यकता है।
15. धातु:
प्रतिकूल मौसम से लौह धातु में जंग लगने की संभावना होती है। सतह को जंग लगने से बचाने के लिए वातावरण के संपर्क से निम्न रुप में बचा जा सकता है।
क.- क्रोमियम प्लेटिंग, निकल प्लेटिंग, जस्ते की कलई आदि अन्य धातु से सतह को प्लेटिंग करना।
ख.- पेंट करना।
ग.- तेल की परत लगाना।
निर्माण कार्य के स्टील, हार्डवेयर, कास्ट आयरन सामान आदि को निम्न रुप से बचाया जा सकता है:
क.- बीम, चैनल, एंगल जैसी मदों को रेड आक्साइड पेंट या जिंग क्रोमेट पेंट से सुरक्षित रखा जाता है।
ख.- माइल्ड स्टील शीटों को क के अनुसार पूर्णत: सुरक्षित रखा जाता है।
गैल्वनाइज शीटों को परिरक्षा की आवश्यकता नहीं, लेकिन उन्हें ढककर रखा जाए।
ग.- पुष्टता के उपयोग वाले स्टील को पेंट नहीं करना चाहिए या तेल नहीं लगाना चाहिए। यदि लम्बी अवधि तक रखना हो तो सीमेंट घोल लगाया जा सकता है।
घ.- बरसाती पानी निकास वाले पाइपों सहित कास्ट आयरन पाइप तथा िफटिंग पर बिटुमिनस पेंट किया जा सकता है।
ड़.- बोल्ट तथा नट पर प्रतिरोधक आई एस-1153-1957 पतला एवं कड़े का कोट को लगाकर सुरक्षित रखा जा सकता है। बहुत छोटे वोल्ट तथा नट यदि पीतल, एलुमीनियम आदि नाम-फेरस मदों को ढककर रखा जाए तो किसी प्रतिरोधी की आवश्यकता नहीं है।
16. प्रकाशिक यंत्र:
कोहरे , झिल्ली पतली सतह या फफूंद लगने से लेंसों को क्षति पहुंचती है। इन सभी तीनों प्रकारों में नमी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है:-
क). कोहरा: यह ग्रे- िफल्म के रुप में पालिश की हुई ऑप्टिकल सतह पर नमी के कारण होता है। रात और दिन के तापमान में अंतर के कारण सतह पर पानी सघन हो जाता है। इस नुकसान को सुखाकर या धूप में रखकर ठीक किया जा सकता है।
ख). झिल्ली या परत बनना: कोहरे के बाद यह दूसरा चरण है। सतह पर कार्बनिक एसिड के जमा होने से कार्बोनेट बनता है तथा कांच पर तैलीय परत जम जाती है। इसका उपाय केवल आप्टीकल सतह पर दुबारा पालिश करना है।
ग). फफूंद लगना: यह कपड़ो के अवांछित रेशों, अंगुलि के निशानों, पेंट के कणों या धूल तक से होता है जो फफूंद को भोजन उपलब्ध कराते हैं। फंगस से निक्षारण होता है जो कांच को अनुपयोगी बना देता है। ऐहितियाती उपाय के रुप में, कपड़े के बैग में रखें उत्प्रेरित सिलिका जैसे अच्छे सुखाने वाले पदार्थ के साथ यंत्रों को हवाबंद कंटेनर में सील करके रखना चाहिए।
17. रंग, तामचीनी, वार्निश, डिस्टेंपर: पेंट में पिगमेंट , बाइंडर तथा थिनर होता है। तामचीनी के बाइंडर में भारी मात्रा में राल का मिश्रण होता है जो सतह को चमकदार तथा कठोर बनाता है। वार्निश में पिगमेट नहीं होता। आमतौर पर यह तेल या स्प्रिट में राल का घोल होता है। डिस्टेंपर सूखा पाउडर होता है या वह तेलयुक्त होता है।
ह्रास: यह अवयवों के निहित गुणों के कारण तथा बाहरी तत्वों के कारण भी होता है। अवयवी तत्वों से होने वाली खराबी में बट्टी या पिण्ड का बनना, पेंट का मोटा होना तथा रंग में बदलाव होना है जबकि ताप, पानी, हवा, आक्सीजन, एसिड तथा एल्कली बाहरी तत्व है।
भंडारण के दौरान सावधानियां:-
क.- पेंट, इनेमल,वार्निश:
1. वाष्पशील विलायक के निम्नतम क्षति के लिए इन्हें ठंडे गोदाम में रखना चाहिए।
2. सूखी रेत की 10 सैमी मोटी परत पर इन्हें रखना चाहिए।
3. वाष्पशील विलायक के वाष्पीकरण से बचाने के लिए उन्हें अच्छी तरह सील करके लीक प्रूफ तथा बिना जंग लगे कंटंनर में रखना चाहिए।
4. यदि किसी कंटेंनर में से लीक हो रहा हो तो उस पदार्थ को अच्छे कंटेनर में डाला जाए।
5. बट्टी बनने से रोकने के लिए प्रत्येक तीन महीने में सीलयुक्त ड्रमों को रोल करना चाहिए तथा पलटना चाहिए।
6. पानी के संदूषण से पेंट के गुणों को बचाने के लिए उसे पानी से न मिलने दें तथा कंटेनरों को जंग लगने से बचाएं।
7. उपलब्ध सुराख से ही सामान निकालें और सुराख न करें। जारी करने के बाद ढक्कन को कसकर लगाएं।
8. ये मदें आग जोखिम वाली हैं। सभी आग सुरक्षा उपाय अपनाएं। काटन अवशेष तथा कबाड़ को दूर रखें।
9. इनके प्रयोग की आयु की जांच करें। फीफों सिध्दाँत को अपनाते हुए निर्माण की तारीख के क्रम में जारी करें। यदि कोई पेंट एक साल से अधिक तक बचा रह जाता है तो इसकी उपयोगिता की जांच करें।
ख.- सूखे डिस्टेंपरों को रैकों में ठंडे शुष्क स्थान पर रखें।
18. प्लास्टिक:
ताप, प्रकाश, नमी की क्रिया , तेजाब एवं एल्कली के संपर्क के कारण इसका ह्रास होता है। आसान तरीका यह है कि निम्नतम वायुसंचालन के साथ अंधेरे, ठंडे तथा शुष्क भंडारण क्षेत्र में इनको रखा जाए।
19. प्लाईवुड:
यह एक बोर्ड होता है जो 3 या अधिक मुलम्मों चिपचिपे पदार्थ से इस प्रकार जुड़े होते हैं कि निकटवर्ती परत का तंतु एक दूसरे के समकोण पर होते हैं। आमतौर पर मुलम्में पर कीटनाशक एएसएसवी या बोरैक्स तथा दीमकनाशक पेंटा क्लोरोफनाल का छिड़काव किया जाता है। क्षति प्राय: छेद करने वाले कीटों से होती है।
निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए:
क.- शीटों का भंडारण समतल आधार पर करें।
ख.- समान आकार की शीटों को एक दूसरे के ऊपर रखें। प्रत्येक ढेर के ऊपर भारी वज़न रखा जाए ताकि शीटों के बीच हवा के लिए कोई जगह न रहे ।
ग.- सबसे नीचे की शीट का निचला सतह नीचे तथा सबसे ऊपर की शीट का ऊपरी सतह पर एएससीवी, सीकोसाइट, कापर नेपेथीनेट आदि कीटनाशकों का छिड़काव करें। इसी प्रकार शीट के चारों तरफ भी छिड़काव करें।
घ.- जारी करते समय ऊपरी तथा नीचे की शीट को छोड़कर बीच की शीट को जारी करें ताकि ढेर सभी छ: साइडों से बचा रहे।
20. पोर्सलीन सैनीटरी का सामान:
भंडारण के तापमान में अस्थिरता के कारण सतह पर बाल की तरह पतली लाइन जैसे क्रैक इस त्रुटि को क्रोंजिंग कहते है आ जाते है। भंडारण तापमान में कोई ज्यादा उतार चढ़ाव न हो, इसे सुनिश्चित करते हुए इस क्रेजिंग को कम किया जा सकता है- हालांकि इसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता।
21. रबड़ का सामान:
ह्रास के लिए जिम्मेवार तत्व:
क.- उच्च तापमान के कारण ह्रास होता है। जहां तक संभव हो 207 सै0 से अधिक तापमान न हो।
ख.- रोशनी विशेषकर धूप से रबड़ का आक्सीकरण होता है।
ग.- तेज झोंके से ताजी आक्सीजन की आपूर्ति होती है जिससे ह्रास को बढ़ावा मिलता है। धीमी प्राकृतिक हवा को बनाए रखने का ध्येय होना चाहिए।
घ.- ओजोन रबड़ का सबसे बड़ा विनाशक है। बिजली की मोटर, स्विच गियर, अन्य इलैक्ट्रानिक उपस्करों के चलने से ओजोन पैदा होती है। ओजोन पहाड़ो की चोटी तथा समुद्री किनारों पर पाई जाती है। रबड़ के सामान को ओजोन के इन स्रोतों से दूर रखें।
ड़.- एसिड, एल्कली, तेल तथा ग्रीस के संपर्क से बचाया जाना चाहिए।
च.- कापर, मैगनीज तथा उनके मिश्रण से आक्सीकरण होता है।
छ.- बजरी तथा धूल नुकसानदायक है।
ज.- बेकार के खिंचान, तोड़-मरोड़ आदि से बचाएं।
भंडारण: भंडारण गोदाम अंधकारपूर्ण, शीतल 27 सै0 से नीचे तथा शुष्क होने चाहिए। खिड़कियों तथा दरवाजों पर लगे शीशे गहरे रंग से रंगे होने चाहिए उन पर परदे लगाने चाहिए। वहां सामान्य हवा होनी चाहिए। गोदाम का तहखाना रबड़ के भंडारण के लिए अधिक उपयुक्त है। उसके नजदीक बिजली के उपकरण नहीं चलने चाहिए।
प्रतिरक्षा: समय-समय पर स्टाक को पलटना चाहिए तथा फ्रेंच चाक या सोप स्टोन पाउडर उन पर छींटना चाहिए।
कुछ विशेष रबड़ का सामान:
क.- टायर: स्टील ट्यूब जैसे सहारे से दो क्षैतिज घेरे में सीधा रखें। प्रत्येक 3 महीनों में टायर का 1/4 हिस्सा घुमाएं।
ख.- ट्यूब: यदि डिब्बों में प्राप्त होते हैं तो इन डिब्बों को बक्सों या शैल्फ में रखें। यदि बोरों में प्राप्त होती है तो बिन या बक्सों में रखें या हुक पर टाँग दें। शैल्फ या बिन के ऊपर ट्यूब पर अनावश्यक दाब नहीं होना चाहिए।
ग.- होज: नमी तथा बैक्टीरिया के प्रवेश को रोकने के लिए सिरों को बंद रखें। सूर्य की रोशनी से बचाएं। समय-समय पर जांच करें।
घ.- मोटे रबड़ की धौंकनी, डायफ्राग्म आदि:- पानी में 20 प्रतिशत ग्लीसरीन का घोल से हल्के से पोछें। इससे कठोरता तथा क्रैक होने में बिलम्ब होगा।
ड़.- रॉलिंग रिंग: झोल से बचाने के लिए रोलर रैक पर रखें। फ्रेंच चाक या सोप स्टोन पाउडर का स्प्रे करें।
22. साबुन: ये प्राय: सब्जियों या जानवरों की वसा , कास्टिक सोडा या कास्टिक पोटाश से बनाए जाते हैं। ये तीन प्रकार के होते है:
टायलट, वाशिंग तथा तरल।
गुणह्रास या विकृति:
क.- मलिनीकरण या डिसकलेरेशन- यह रोशनी के कारण होता है।
ख.- बासीपन नम हवा में आक्सीजन के कारण साबुन का रंग बदल जाता है तथा दुर्गन्ध निकलता है।
ग.- गलना तथा पपड़ी बनना: साबुन की सतह पर वायमंडलीय नमी के सघन होने से ऐसा होता है। सतह पर आम नमक की परत जमा हो जाती है।
भंडारण में सावधानियां: जलरोधी मोमी काग में पैक कर ठंडे शुष्क स्थान पर रखें। तरल साबुन को अपारदर्शी हवाबंद कंटेनरों में रखना चाहिए।
23. स्प्रिट: बंद कंटनरों में वाष्पीकरण से बचाने के लिए ठंडे, अच्छे वायुसंचार गोदामों में रखें। पर्याप्त अग्नि सुरक्षा उपलब्ध कराएं। आस-पास सीधी लौ या धूम्रपान की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
24. टेक्सटाइल: सूती कपड़े को सूक्ष्म जीवों तथा दीमकों से क्षति पहुंचती है। ऊनी कपड़े को सूक्ष्म जीवों, दीमक, बुली बियरस, कपड़े का कीड़ा, कारपेट भूंग आदि नुकसान पहुंचाते है। सूक्ष्म जीवों द्वारा क्षति तब पहुंचती है जब कपड़े में नमी के तत्व ज्यादा होते है और प्राय: इससे कपड़ो का रंग उड़ता है तथा वस्त्र नरम हो जाता है।
उपाय- सूती कपड़ा:
क.- 6 से 8 घंटे तक धूप में रखें, ब्रश करें तथा साफ करें।
ख.- टेंट, तिरपाल आदि जैसी मदों पर, जो मानव शरीर के सीधे संपर्क में नहीं आती, इन्हें सड़ने से बचाव के लिए कापर-क्रोम बोरिक, कॉप-क्रोम-एरसेनिक, एसिड-क्यूपरिक-क्रोमेट, पेंटा- क्लोरो-फेनाल आदि फफूंद रोधी से छिड़काव चाहिए।
ग.- कुछ पदार्थ, जो मानव शरीर के संपर्क में इस प्रकार आते हैं जिससे नमी को नियंत्रित करना पड़ता है, लीक न होने वाली छतों तथा प्राकृतिक वायुसंचार उपलब्ध कराने के लिए काफी बड़े दरवाजे, खिड़कियों तथा रोशनदान वाले गोदाम में रखा जाए। सामान को उचित निभार सीमेंट कंक्रीट के फर्श से कम से कम 30 सै0मी0 तक और कच्चे फर्श से 45 से 60 सै0मी ऊपर होने चाहिए। बंडलों/ गठरियों को खोलकर नियमित रुप से जांच करें। अन्य सामानों की भी नियमित जांच करें।
उपाय: ऊनी: ऊनी कपड़ों को जीवित या मृत लाखा, पंतगे तथा अनियमित छिद्रों से नुकसान पहुंचता है। निम्नलिखित तरीकों से विसंक्रमण किया जाता है:-
क.- कार्बन टेट्राक्लोराइड का धुंआ छोड़ा जाय। इसके लिए 1 सीसी प्रति लीटर आयतन का उपयोग करें। फ्यूमीजैंट को छिछले बर्तनों में कम से कम 72 घंटे तक कक्ष में रखें।
ख.- गर्म हवा का विसंक्रमण करें। सामान पर 60 सै0 से 80 सै0 की गर्म हवा 45 से 60 मिनट तक छोड़े।
ग.- निर्मल धुलाई करें।
पुन: विसंक्रमण को निम्न द्वारा रोका जाता है:-
क.- नेफ्थेलीन के साथ पैकिंग करें। नेफ्थेलीन, कैम्फर या पैराडिक्लोबेंजीन को 1 ग्रा0 प्रति लीटर आयतन की दर से हवाबंद पैकेजिंग में उपयोग करें। वाष्प के इस घोल को बनाए रखने के लिए समय समय पर परिरक्षक मिलाएं। लम्बे समय तक भंडारण के लिए आयतन के अनुसार 5 ग्रा0 प्रति लीटर उपयोग करें तथा प्रति वर्ष इसकी भरपाई करें। सोने तथा चाँदी की इम्ब्रायडरी वाले कपड़ों पर इसका उपयोग न करें।
ख.- भंडार की नियमित जांच करें।
25. लकड़ी:
लकड़ी को लठ्ठे के रुप में काट कर टुकड़ों में रखते हैं। लठ्ठे के रुप में इसे पानी जलीय भंडारण या खुले में पार्थिव भंडारण में रखा जा सकता है। जलीय भंडारण में लठ्ठे पूरी तरह से डूबे होने चाहिए। बहता पानी सर्वश्रेष्ठ है। यदि इसे रुके हुए पानी में रखा जाता है तो खमीरीकरण द्वारा उत्पन्न अम्लीय उत्पादों के प्रतिकूल प्रभावों से बचाने के लिए समय- समय पर पानी को बदलते रहना चाहिए । पार्थिव भंडारण में लठ्ठों की छाल छीलकर तथा पास-पास ढेर में उचित निभार पर रखें।
कटे हुए टिमबर को पानी में नहीं रखें।
सबसे अच्छा तरीका यह है कि इसे अच्छे रोशनदान वाले यथोचित शैडों में रखा जाए जहां ढेरों के बीच तथा ढ़ेर के अंदर भी उचित हवा का संचार हो। यदि शैड उपलब्ध नहीं है तो खुले में रखें जिसे ऐस्बेस्टस शीट, खपरैल या तिरपाल द्वारा उचित ढलान के साथ ढ़कें।
कटे हुए टिम्बर को सीझांए। तुरंत कटे हुए टिम्बर में भारी मात्रा में पानी होता है तथा कीट तथा फफूंद लगने से रोकने के लिए नमी की मात्रा को टिम्बर के शुष्क भार के 14 प्रतिशत से कम तक नीचे लाया जाय।
निम्न साधनों से सिझाई करें:
क.- वायु सिंझाई- वायुमंडलीय तापमान तक टिम्बर को सुखाएं ।
ख.- भट्ठे पर सिंझाई- नियंत्रित तापमान पर गर्म हवा के प्रवाह में टिम्बर को सुखाएं।
ग.- रासायनिक सिंझाई- कैल्शियम क्लोराइड जैसे सुखाने वाले पदार्थ से अधिक नमी को सुखाएं।
घ.- वाष्प सिंझाई- साइलीन, टोल्यून आदि जैसे वाष्पीकरण घोल से टिम्बर के पानी को निकालें।
क तथा ख सबसे अधिक प्रचलित विधियां है।
भंडारण के साधन:
भंडारण हेतु प्रयोग में लाये जाने वाले साधनों में मुख्य प्रकार से प्रयोग किए जा रहे साधन निम्न प्रकार से है:-
खुली आलमारी:
स्टोर के अन्दर रैक के रुप में बनी बराबर खानों वाली खुली आलमारी की सामग्री के लिए प्रयोग में लाया जाता है, जिसे बेज के नाम से भी पुकारा जाता है। यदि एक से अधिक बेज रखनी हो तो आगे-पीछे रखी जाती है, ताकि आने-जाने का रास्ता बना रहे। बेज की चौड़ाई इनमें रखी जाने वाली सामग्री के भार तथा मात्रा पर निर्भर करती है।
साधारण रैक्स:
यह एक ऐसा ढांचा है, जिसमें विभिन्न प्रकार की सामग्री रखी जा सकती है। यह दोनों तरफ से खुले शेल्वस के रुप का होता है। रैक्स एक तरफ से भी खुले हुए हो सकते है। अंत: इनकी बनावट भंडार में रखी जाने वाली सामग्री की आवश्यकता के अनुसार हो सकती है। इनको किसी भी सामग्री से बनाया जा सकता है। जैसे लकड़ी, सीमेंट व स्टील आदि से। इनका वर्गीकरण इनके लिए प्रयोग की जाने वाली सामग्री के आधार पर किया जा सकता है। जैसे लकडी के रैक्स, स्टील के रैक्स एवं सीमेंट के रैक्स इत्यादि। रैक्स आवश्यकतानुसार बहुब सी किस्मों के बनाये जाते हैं। रैक्स स्टोर साधनों का मूलभूत आधार है। जैसे ऊपर उल्लेखित किया जा चुका है। यह विभिन्न प्रकार की सामग्री से तैयार किये जा सकते है। रैक्स का वर्गीकरण निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है:
1. स्टील रैक्स: यह लम्बे समय-काल तक चलने वाले, एकरुपता में अच्छे दिखाई देने वाले तथा कम स्थान घेरते है। आजकल इनका प्रयोग प्राय: सभी संस्थानों में देखने में मिलता है। यह रैक्स विभिन्न प्रकार के होते हैं और एंगल आइरन तथा 16 अथवा 18 गेज की स्टील की चद्दर से तैयार किए जाते है।
2. लकड़ी वाले रैक्स: इनका प्रयोग उन सभी प्रकार की स्टोर सामग्री की मदों के लिए किया जाता है, जहां सस्ती स्टोरेज सुविधा वांछित हो। लकड़ी हर जगह उपलब्ध होने के कारण इनकी लागत स्टील के रैक्स से इनकी कीमत लगभग आधी होती है। लकड़ी के रैक्स तभी उचित होते हैं, जब लगातार अथवा लम्बे बिन अथवा शेल्वस एक इकाई के रुप में दिवारों के साथ बनाये जाते हैं। यह नाजुक स्टोर मदों के लिए अत्यधिक उचित कहे जाते हैं।
3. बजरी रैक्स: बजरी के रैक्स साधारणतया दिवारों में बनाये जाते हैं और इनका प्रयोग घरेलू सामान से लेकर भारी स्टील ढांचे तक का सामान रखा जा सकता है। इनका प्रयोग राड, एंगल, चैनल्स, हल्की रेल और अन्य रोल्ड विभाग के लिए किया जाता है।
नमूने के अनुसार
क.- शेल्वस रैक्स
ख.- बिन रैक्स
ग.- बार रैक्स
क.- शेल्वस रैक्स:- इस प्रकार के रैक्स को दो भागों में बांटा जाता है। एक शैल्वस रैक्स पीछे और आगे से दरवाजों द्वारा बन्द होते हैं अर्थात् अल्मारी के नमूने के रुप में होते हैं। दूसरे प्रकार के शेल्वस रैक्स दोनों तरफ से खुले होते हैं।
ख.- बिन रैक्स:- बिन्स एक प्रकार का बक्सा होता है अथवा अल्मारी के खाने के रुप में होता है। इसका प्रयोग स्टोर की प्रत्येक मद के लिए प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार के बिन्स कोयला बिन अथवा बेकार वस्तु डालने हेतु बिन प्रयोग किया जाता है।
एक ट्रेक बिन अथवा स्टील बिन में छोटे-छोटे कई खाने रेक में बनाये जाते हैं अथवा आलमारी दो शेल्वस के बीच बनाई जाती है। इस प्रकार का बिन बहुत प्रयोग में लाया जाता है। इस प्रकार के बिन्स को कबूतर खाने वाले बिन कहा जाता है। लकड़ी व स्टील बिन संतोषजनक स्टोरेज सुविधा प्रदान करते है।
बिन्स को सदैव स्टोर में रखा जाता है, क्योंकि सामग्री की बहुत छोटी-छोटी मदें सम्भाल कर कबूतर खाने वाले बिन्स में रखी जाती है।
रैक्स जिनमें बिन्स लगे होते हैं एक-दूसरे के आगे-पीछे रखने चाहिए। इससे उनमें रखी सामग्री आसानी से निकाली जा सकेगी। इससे थकान की बचत होती है।